कविताएं/Poems/कविता

Original thought: Hindi

Poems

In my personal life, I have always given an almost unsurmountable importance to poems. There were many poems that I have learned as a child in the school. I can still recite those word-to-word. I always experienced that these poems were a collage or a bundle of a variety of emotions. Some of the poems narrate a story, whereas some other ones take you to wander in the land of dreams and imagination. Some of them give you the much-needed assurance and a hope and enthusiasm to continue living your life fruitfully. To put it poetically, some of these poems would fill you up with a zest that could help you believe in a motive, for which you would not mind dedicating your whole life.

But on this last day of the year, why am I suddenly speaking to you on behalf of poems?

Now-a-days I have started getting this feeling that maybe people are starting to forget about poems. Children do come across various poems during their school years. That’s definitely true. However, many of them simply forget about poems, in general, in their later life. And why is that the case? The most probable explanation for this could be that people do not feel that poems are important or they serve any purpose.

In earlier times, there would be these amazing musical shows and plays which people would flock to watch. There was hardly any other entertainment. There would be many songs and poems incorporated in such plays. Things have changed. We don’t want to watch films with lots of poems and songs and lengthy dialogues. Thus, the duration of films has reduced considerably. In turn, there is simply no special footage in the film for songs and poems.

I believe, though this is the case, all has not been lost yet. There are still many people across the world who prefer to express their feelings through their poems. Without they themselves being aware, while expressing their own emotions, people also echo someone else’s feelings and emotions in their poems.  

Thus, while reading many-a-poems, I have experienced that these are indeed my emotions, and I wondered how did the poet know about what exactly I was going through. A famous writer has stated that the more we talk about our inner drives, urges, and the resulting emotions, the more they would be universal in nature.

Thus, while writing a poem, a poet’s primary aim would be to express his own situation. However, when others read the poem, everything in the poem belongs to the reader as much as it did to the writer when it was written in the first place.

This is me sharing with you a poem I wrote when I was a child:

To write a poem

Dreams were woven

Millions of imaginations

Reality searched

Inferences reached

To write a poem

Roads of poverty

Mansions of prosperity

In between lies humility

And the role of an agony aunt

To write a poem

Each heart, optimistic

With a lot of mouths swearing

Full of complaints

Some implementations

To write a poem

An attempt to understand

An attempt to feel

A courage to go that extra mile

Reading loads of poem

To write a poem

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मूल विचार: हिन्दी

कविताएं

मेरी खुदकी जीवन में कविता का महत्व हमेशसेही अनन्यासाधारण रहा हैं। बचपन में सीखी हुई कई कविताएं मुझे अबभी जबानी याद हैं। उन कविताओंमें कई तरह की भावनाओं का मिलाफ़ मैंने सदाही महसूस कीया हैं। कुछ कविताएं कोई कहानी कहती थी और कुछ सपनों की दुनिया में लेके जाती थी। लेकिन कुछ कविताएं ऐसी थी जो हौसला देती थी, जीवन जीने की आशा और उत्साह दे जाती थी, कुछ कर दिखाने के लिए, कविता की भाषा में कहा जाए तो किसी उद्देश के लिए मरने और मिटने का धीरज दे जाती थी।

लेकिन आज साल के अंतिम दिन, मैं कविता की इतनी मुखालिफत क्यों कर रहीं हूँ भला?

आज-कल लगने लगा हैं की कविताएं शायद भूली तो नहीं जा रहीं? बच्चे पढ़ लेते हैं कविताएं विद्यालय में। जरूर ही। लेकिन उसके बाद कविता का जैसे अस्तित्व कई लोगों के जीवन से खत्म हो जाता हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि शायद आज उनकी इतनी अहमियत लोगों को महसूस नहीं होती।

पहले जमाने में कई तरह के नाटक भी बहुत सारे गानों के साथ और कविताओं के साथ पेश किए जाते थे। लेकिन आज-कल हमें फिल्मों के गाने भी इतने नहीं भाते। इसलिए फिल्म भी कम लंबाई की बनाई जाती हैं। जाहीर सी बात हैं, उसमें गानों और कविताओं के लिए कोई खास जगह नहीं होती।

ऐसी स्थिति होकर भी कुछ नहीं बिगड़ा हैं। आज भी ऐसे लोग हैं जो अपने जज़्बात कविताओं के जरिए से बयां करते हैं। और ऐसे करते हुए किसी और के जज़्बातों को भी कभी कबार बयां कर जातें हैं।

कविता पढ़ते हुए मुझे कई बार ये महसूस हुआ है की ये तो मेरी भावनाएं हैं। इन कवि को कैसे ज्ञात हुई? किसी लेखक ने कहा हैं की हमारी बात जितनी ज्यादा अंदरूनी होती हैं उतनी ही ज्यादा वो वैश्विक होती हैं।

शायद इसीलिए कविताएं जो लिखते हुए एक कवि खुद के लिए लिख देता/देती हैं, लेकिन जब वो बाकी लोग पढ़ते हैं, वो उतनीही उनकी हो जाती हैं जितनी वह उस कवि की लिखते वक्त थी।

ऐसी ही मेरी एक बहुत पुरानी बचपन में लिखी हुई कविता आपको अर्पण:

क्योंकी एक कविता लिखनी थी।

बहुत सपने संजोए

लाखो कल्पनाए की

परिस्थिती की जाँच की

कैसे कैसे अनुमान लगाए

क्योंकी एक कविता लिखनी थी।

रास्तों की गरीबी देखी

महलों की अमिरी परखी

ट्रेनों की मानवता समझी

और ढेर सारी फरियादे सुनी

क्योंकी एक कविता लिखनी थी।

हर एक के दिल में आस थी

कईयों के मुहँ से गालियाँ सुनी

बहुत गिले शिकवे किए

कुछ बातों पे अमल भी किया

क्योंकी एक कविता लिखनी थी।

जो देखा वो समझना चाहा

जो समझा वो जानना चाहा

कुछ कर गुजरनेका अरमान रखा

बहुत सारी कविताए पढी

क्योंकी एक कविता लिखनी थी।

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मूळ विचार: हिन्दी

कविता

माझ्या जीवनामध्ये कवितेचं महत्व नेहमीच अनन्यसाधारण आहे. लहानपणी शिकलेल्या कविता मला आजही तोंडपाठ आहेत. या कवितांमध्ये नेहमीच मला अनेक प्रकारच्या भावनांचा संगम दिसून आला आहे. काही आपल्या कथा सांगतात तर काही आपल्याला स्वप्नांच्या गावाला घेऊन जातात. काही कविता जगण्याची उमेद देऊन जातात. आता कवितेच्याच भाषेत सांगायचं झालं तर काही कविता कुठल्यातरी ध्येयासाठी झपाटून जीवाची बाजी लावायचं धैर्य देऊन जातात.  

पण आज वर्षाच्या शेवटच्या दिवशी मी कवितेची इतकी बाजू घेऊन बरं बोलत्येय?

हल्ली मला वाटू लागलंय की लोकं कविता विसरून तर जात नाहीयेत ना! मुलं शाळेत कविता शिकतात. नक्कीच. पण त्यानंतर अनेक लोकांच्या आयुष्यात कवितेला काहीच महत्व नसतं. असं का? कारण हल्ली लोकांना कविता फारशा गरजेच्या वाटत नसाव्यात.

जुन्या काळी अनेक नाटकांत, कार्यक्रमांत गाणी आणि कविता असायच्या. परंतु हल्ली आपल्याला चित्रपटांत देखील गाणी नकोशी वाटतात. आणि म्हणूनच की काय चित्रपटांची लांबीदेखील कमीच असते. म्हणूनच त्यात गाणी आणि कवितांना विशेष अशी जागा दिलेली नसावी.

असं असूनही अगदीच सगळं बिघडलं नाहीये. अजूनही असे लोक आहेत ज्यांना आपल्या भावना कवितेद्वारे मांडणंच सहजपणे जमतं. आणि स्वतःच्या भावना व्यक्त करता करता हे लोक अनाहूतपणे अनेक इतरांच्या भावनांनाही वाट करून देतात.

कविता वाचताना मला अनेक वेळा हे जाणवलं आहे की अरे! ह्या तर माझ्या भावना आहेत. या कवि महशयांना कसं काय बरं कळलं? कोण्या एका लेखकाने म्हटलंय की आपण जेवढं आंतरिक भावनांविषयी बोलू जातो तितकंच जास्त ते वैश्विक होत जातं.

कदाचित म्हणून कविता लिहिताना कवि जरी स्वतःच्या भावना व्यक्त करण्यासाठी ती लिहीत असला/असली तरी ती कविता वाचताना मात्र ती वाचकाची होऊन जाते, जितकी ती लिहिताना कवीची होती तितकीच!

अशीच एक माझी खूप जुनी लहानपणी लिहिलेली कविता तुम्हाला अर्पण:


अनेक स्वप्नांत रममाण झाले

लाखो कल्पना केल्या

परिस्थितीची पारख केली

कविता लिहीण्यासाठी

रस्त्यावरची गरीबी पाहिली

महालांतली श्रीमंती अभ्यासली

आगगाडयांतली मानवता समजून घेतली

ऐकल्या अनेक तक्रारी 

कविता लिहिण्यासाठी

प्रत्येक हृदयात होती एक आस 

ऐकली काहींची शिवराळ वाणी

खूप तक्रारी केल्या गेल्या

आणि केली थोडी अमंलबजावणी

कविता लिहिण्यासाठी

केला प्रयत्न दिसेल ते समजून घेण्याचा

केला प्रयत्न दिसेल ते उमजण्याचा

ठेवली हिंमत काही करून दाखवण्याची  

वाचून काढला पुष्कळ काव्यसंभार 

कविता लिहिण्यासाठी

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