पहिला उरला नाहीस तू You are not like before… आप पहले जैसे नहीं रहें।

मूळ विचार: मराठी

पहिला उरला नाहीस तू

“पहिला उरला नाहीस तू, असा कसा बदललास तू”

ऐंन दिवाळीत या ओळी मला शोधत आल्या. मन अगदी भरून आलं “दहावी फ” चित्रपटाच्या आणि इतर अनेक रंगीबेरंगी आठवणींनी. साधं जगणं आणि रोजच्या दिनक्रमात अशी काही लज्जत आणली या मैदूतल्या चित्रपटाने की मन अगदी फूलपाखरासारखं हलकं झालं. आळसावलेल्या मनाला नवा हुरूप आला. अगदी आत समाधान दाटलं.

का? कधी? कसं? हे प्रश्न पडले तरी त्यांची उत्तरं शोधायलाच हवीत असं बंधन नाही. बंधन स्वतःचं स्वतःलाच! मन मोकळं झालं की जगणंही कसं अगदी सुरळीत सुटसुटीत होऊन जातं. मन बदलंतंच रहातं. नवीन निर्णय घेत राहतं. मग आजूबाजूच्या माणसांना उगीच वाटत राहतं की हा माणूस बदलला. माणूस तोच असतो. त्याची वाट वेगळी होते. मग कोणी म्हणतं की तू आधीचा उरला नाहीस.

मग कवितेत याला पुढे उत्तर देताना दूसरा मित्र म्हणतो तसं आपणही म्हणावं, “अरे यार, तूच असं म्हटलंस तर कसं चालेल?” आयुष्य असंच चालत राहणार. आपणंही वेगवेगळ्या वाटा निवडत राहणार.

इतरांनाही त्यांच्या प्रश्नांची उत्तरं द्यायला आपण उगीच स्वतःला बांधून घेतो. क्षणभर थांबून विचार केला तर जाणवतं की दोन व्यक्ति एकमेकांना किती ओळखू शकणार? शं ना नवरे यांचं एक पात्र म्हणतं, “दोन माणसांची आयुष्य रेषांसारखी असतात. त्या रेषा एकमेकांना एका विशिष्ट बिंदूत छेदतात. तेवढया वेळापूरतीच दोन माणसं एकमेकांना ओळखतात.” हे एकदा मान्य केलं आणि स्वीकारलं की मग प्रश्न पडत नाहीत. कारण विश्वास वरचढ ठरतो.

मित्र-मैत्रिणींचं हे असंच असतं. समजून घेणं हे सगळं असण्यापेक्षा महत्वाचं असतं. एकदा सहज हे समजून घेणं जमलं की बाकी सारं आपोआप जुळून येतं. वाटा कितीही वेगळ्या झाल्या तरीही मनातलं मैत्रीचं झाड कायम बहरतंच राहतं. त्या झाडाला शिशिर काय हेदेखील कळत नाही. स्थळ, काळ, वेळ यांची सारी बंधनं पार करून सगळ्या आठवणी भेटायला येतात आणि मन उजळून जातात.

आठवणींचा क्षण इवलासा असला तरी वाट उजळायला, मार्ग दाखवायला पुरेसा ठरतो. काय काय आठवतं. लाटांवर लाटा येतात. उत्साहाची भरती देऊन जातात. पुनः पुनः साथ करत राहतात.

कवितेतली ती ओळ, “ही तुझी तुझी उभारी माझी माझीच तर आहे सारी” सार्थ करतात. कवितेच्या शेवटी मित्र म्हणतो तसं आपल्यालाही म्हणावंसं वाटतं, “इस बातपर और, एक और चाय हो जायl”

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Original thought: Marathi

You are not like before…

“You are not like before, how did you change”

In the midst of the festival of light, “Diwali,” these lines from a poem, which itself was a part of a film, found me all of a sudden. The poem filled my heart with a lot of memories of that film and a lot of other colourful memories. The simple and quite mundane routine of everyday was changed into a shade of vibrance, thanks to these memories. The mind had become quite lazy; now, it was ready for anything and everything that could come its way. It felt energetic. Deep within, a sense of satisfaction started taking shape.

When we are asked or face questions like what, when, and how, it is really not necessary to find answers. There is no compulsion. We are bound by our own expectations. When the mind is freed of any such bondage, life also becomes much simpler, obvious, and free flowing. Mind keeps changing, anyways. The body is the same. We are same. But the mind keeps taking new decisions, and the people around think that the person has changed. That’s not the case. It is simply that their life has shifted gear, and is testing a new route. People don’t really understand this, and keep telling us that “you are not the same anymore…”

We should also give the answer that the friend in the poem chooses to give, “being my friend, at least you shouldn’t be saying this.” Life would go on no matter what. We, all of us, would keep choosing different routes.

It is a futile when we assume us to be answerable toward questions raised by others. If we pause a while and think clearly, we may realise that two people could not really know each other much. One of the characters in a novel by S N Navare states, “lives of two people are like two lines. These two lines would intersect each other in a particular dot. That’s the amount of information and understanding two people have about each other.” Once we accept this fact, there is no room for questions. We tend to trust and have faith.

Friendship is such a relationship, where understanding each other is more important that having anything else. When we start finding developing such “understanding” easy, everything else falls in place automatically. Then, it doesn’t matter who you are, where you are, and how much you have changed, you have the greenery of friendship in your heart that never withers. It doesn’t even know what is winter and fall. There is no limitation. Transcending all the boundaries of place and time, these evergreen memories come to meet us, and enlighten our mind.

Memories could be little, tiny even, but they are enough to show the right path. We remember all the trivial and not so trivial things, and they continue like the waves of the sea. They rejuvenate. They are our true companions.

All these prove the line form that poem, “this enthusiasm and energy of yours is all mine.” Then, we may feel like telling our friend, like the poem, “let’s have a cup of tea.”

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मूल विचार: मराठी

आप पहले जैसे नहीं रहें।

“आप पहले व्यक्ति नहीं हैं, आपने इसे कैसे बदल दिया?”

ये पंक्तियाँ ऐन दिवाली पर मुझे ढूँढ़ती हुई आयीं। मन फिल्म “दहवी एफ” की यादों और कई अन्य रंगीन यादों से भर गया। सादा जीवन जीना और ऐसी शर्मिंदगी को अपनी दिनचर्या में लाना, इस मैदुता फिल्म ने मेरे दिमाग को तितली की तरह हल्का कर दिया। आलसी मन को एक नया रूप मिला। अंदर ही अंदर संतोष था।

क्यों? कब ऐसा कैसे यदि ये प्रश्न पूछे भी जाते हैं, तो भी उत्तर खोजने की कोई बाध्यता नहीं है। बंधन ही! जब मन मुक्त होता है तो जीवन कैसे सुचारु रूप से चलता है। मन बदलता रहता है। नए फैसले लेते रहते हैं। तब उसके आसपास के लोग यही सोचते रहते हैं कि यह आदमी बदल गया है। आदमी वही है। उनका इंतजार अलग था। तब कोई कहता है कि तुम पहले वाले नहीं हो।

फिर कविता में इसका और उत्तर देते हुए, जैसा कि दूसरा मित्र कहता है, हमें यह भी कहना चाहिए, “अरे यार, अगर तुम ऐसा कहोगे, तो यह कैसे काम करेगा?” जीवन ऐसे ही चलता है। आप भी अलग-अलग शेयर चुनते रहेंगे।

हम दूसरों के सवालों के जवाब देने के लिए खुद को बांधते हैं। अगर आप एक पल के लिए सोचें, तो दो लोग एक-दूसरे को कितना जानते हैं? शान ना नवरे के पात्रों में से एक कहता है, “दो लोगों का जीवन रेखाओं की तरह होता है। वे रेखाएँ एक निश्चित बिंदु पर प्रतिच्छेद करती हैं। तभी दो लोग एक दूसरे को जान पाते हैं।” एक बार जब यह स्वीकार और स्वीकार कर लिया जाता है, तो कोई प्रश्न नहीं रह जाता है। क्योंकि विश्वास की जीत होती है।

दोस्तों के साथ ऐसा ही होता है। सब कुछ होने से ज्यादा जरूरी है समझना। एक बार यह समझना आसान हो जाता है कि बाकी सब कुछ अपने आप एक साथ आ जाता है। शेयर कितना भी अलग क्यों न हो, दिल में दोस्ती का पेड़ हमेशा उगता रहेगा। वह पेड़ भी नहीं जानता कि सर्दी क्या है। स्थान, समय, समय के सभी बंधनों को पार करने के बाद, सभी यादें मिलती हैं और मन प्रबुद्ध होता है।

याद का क्षण भले ही इवलसा हो, राह दिखाने के लिए इंतजार ही काफी है। आप को क्या याद आता है? लहरें लहरों पर आती हैं। उत्साह से भरती हैं। मिलते रहें।

कविता में पंक्ति का अर्थ है, कविता के अंत में, जैसा कि मित्र कहते हैं, हम यह भी कहना चाहते हैं

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