Is the grass always greener on the other side of the river? /क्या दूर के ढोल सुहावने होते हैं?/ दुरून डोंगर साजरे?

Original thought: Hindi and English


Is the grass always greener on the other side of the river?

When we go out for watching a movie, we discuss different roles played by different actors. When we look at the protagonist and say he was a banker, we forget to add that he also was a father, husband, son, brother, friend, citizen, human being and so on. Though we say that he is playing one particular role, in reality he is playing so many other roles. Same is the case with us.

Every day, we play different roles in our lives. As we grow, the number of roles that we have to play keeps increasing. For example, when we grow in age, we become elder siblings to someone. When we get a professional degree in engineering, we become engineers. When we grow in professional experience, we become mentors and managers. When we grow up in decision making, we become husband or wife and then parents.

I have always heard people saying that a job of an actor is very difficult. When I look at these roles, I feel for the actor the role play ends where the show ends or camera stops rolling. On the other hand, for us, common people, it never ends. For the actor, the writer decides the fate of the character and for us it is our decisions that affect our fate. This feeling of responsibility can make the role burdensome. Hence, we all feel that it is better to be someone else as their role seems easy.

The following poem talks about such roles and ventures to even suggest a different understanding/perspective.

Listen to this village’s story that I am telling

King without a queen and queen without a king

Many a times, this story has been told and heard

Though we don’t know much, it needs to be retold

With a village named Village and king named King

River named river, a queen but a Queen

In the one of a kind village, lived children called Children

Though naughty, playful, their hearts were golden

Both sit one day after a hefty play

Boredom gave way to research of new way

I shall be the King and You the Queen

Together we act their interesting story scene

Childhood left behind, both became adults

Queen was busy and King too had to work

Clever Children decided to reverse their act

King is Queen and Queen is king was the new pact

Changed roles didn’t change the work condition

Frustrated and irritated, both made a big commotion

Observing this, there arrived the real King and Queen

Let’s become Children, their makeup was keen

To the children, being naughty wasn’t free

Liars getting scolded by adults was a guarantee

Village and River both got interested in this affair

Clothes dried on Village boundary and River banks hosted fun fair

Clothes or fun fair, both had to be looked after

Work always came first, rest was later

Village, River, Two Children, King, Queen explain

Take up their role to understand their pain

Each of their role, then everyone started loving

Why they dreamt of becoming other, is a matter surprising


मूल विचार: हिंदी और अंग्रेजी


क्या दूर के ढोल सुहावने होते हैं?

जब हम फिल्म देखते हैं, तो हम विभिन्न अभिनेताओं द्वारा निभाई गई विभिन्न भूमिकाओं पर चर्चा करते हैं। जब हम नायक को देखते हैं और कहते हैं कि वह एक बैंकर था, तो हम यह जोड़ना भूल जाते हैं कि वह एक पिता, पति, पुत्र, भाई, दोस्त, नागरिक और इंसान भी था। हालांकि हम कहते हैं कि वह एक विशेष भूमिका निभा रहा है, वास्तव में वह कई अन्य भूमिकाएं निभा रहा है। हमारे साथ भी ऐसा ही है।

हर दिन, हम अपने जीवन में विभिन्न भूमिकाएँ निभाते हैं। जैसे-जैसे हम बढ़ते हैं, हमारी भूमिकाएँ उतनी ही बढ़ती रहती हैं। जैसे की, जब हम उम्र में बड़े हो जाते हैं, तो हम किसी के लिए बड़े भाई-बहन बन जाते हैं। जब हम इंजीनियरिंग अभ्यास कर उपाधि प्राप्त करते हैं, तो हम इंजीनियर बन जाते हैं। जब हमारा काम का  अनुभव बढ़ता हैं, तो हम अध्यापकीय और व्यवस्थापकीय भूमिकाएँ निभाने लगते हैं। जब हम निर्णय लेते हुए बढ़ते हैं, हम पति या पत्नी और फिर माता-पिता बन जाते हैं।

मैंने हमेशा लोगों को यह कहते हुए सुना है कि एक अभिनेता का काम बहुत कठिन होता है। जब मैं इन भूमिकाओं को देखती हूँ, तो मुझे लगता है कि अभिनेता की भूमिका नाटक के अंत में या फिर कैमेरा रुक जाने पर समाप्त होती हैं। दूसरी ओर, हम आम लोगों के लिए भूमिकाएँ कभी समाप्त नहीं होती। अभिनेता के लिए लेखक निर्णय लेकर भूमिका के भाग्य का फैसला करता है किन्तु हमारे लिए हमारे फैसले ही हमारे भाग्य को प्रभावित करते हैं। जिम्मेदारी की यह भावना भूमिका निभाना अपने आप में एक बोझ बना देती है। इसलिए शायद हम सभी को लगता है कि किसी और की भूमिका बेहतर और आसान है।

निम्नलिखित कविता ऐसी भूमिकाओं के बारे में बात करती है और अपना दृष्टिकोन बयान करती है।

आओ तुम्हें सुनाते हैं कहानी एक गांव की

एक राजा बिन रानी का और रानी बिन राजा की

सुनी सुनाई कही बताई ऐसी ये कहानी हैं

नाम पता न इसका जानो फिर भी इसे सुननी है

गांव का नाम था गांव और राजा का नाम राजा

नदी कहलाए नदी जहाँ रानी को क्या कहे दूजा

इस अनूठे गांव में दो बच्चे नाम के बच्चे थे

चंचल नटखट जरूर थे पर मन के बड़े सच्चे थे

एक दिन दोनों खेल कूदकर थककर ऐसे बैठे थे

बोरियत के बहाने बनाते कुछ नए खोज के चर्चे थे

मैं बन जाऊ राजा तुम खुदको कहलाना रानी

दोनों मिलके बतियाएंगे फिर कोई इनकी कहानी

अपना बचपन त्याग ये बच्चे राजा-रानी बन बैठे

काम काज में डूब गई रानी राजाजी भी उसमें खो बैठे

दोनों बड़े सयाने थे सोचा उलट-पुलट हो जाए

राजा बन जाए रानी और रानी को राजा कहलाए

नाम बदल भी गया परन्तु काम से न छूटा पल्ला

दोनों ने तंग हो कर फिर खूब मचाया हल्ला

देख ये नाटक असली के राजा-रानी भी पधारे

दो बच्चे बन जाने के लिए उन्होंने अपने रूप सवारें

बच्चे बनने पर भी शैतानी पर कोई नहीं थी छूट

डाँट लगाते बड़े सभी जब कोई कह जाता झूट

गांव नदी ये देख रहे थे सोचे क्यों न ये खेल खेलें

गांव के तटपर सूखे कपड़ें और नदी के तटपर मेले

कपड़ें हो या मेला निगरानी तो करनी पड़ती

काम अकेला कभी न रहता बात माननी पड़ती

गांव नदी दो बच्चे राजा-रानी भी समझाए

जिसका पहनो रूप उसकी ही तकलीफ समझ में आए

सबको फिर भानें लगे बस रूप अपना अपना

ताज्जुब हैं फिर भी हर कोई क्यों देखें अलग रूप का सपना?


मूळ विचार: हिंदी आणि इंग्रजी


दुरून डोंगर साजरे?

जेव्हा आपण एखाद्या चित्रपट पाहतो तेव्हा आपण वेगवेगळ्या कलाकारांच्या वेगवेगळ्या भूमिकांवर चर्चा करतो. जेव्हा आपण नायककडे पाहतो आणि म्हणतो की तो एक बँकर आहे, तेव्हा आपण हे विसरतो की तो एक पिता, पती, मुलगा, भाऊ, मित्र, नागरिक, माणूस इत्यादी देखील होता. जरी आपण म्हटले की तो एखादी विशिष्ट भूमिका साकारत आहे, तरी प्रत्यक्षात तो इतर बर्‍याच भूमिका साकारत असतो. आपलेही असेच असते.

आपण आपल्या दैनंदिन जीवनात वेगवेगळ्या भूमिका बजावतो. जसजसे आपण मोठे होतो तसतसे आपल्या भूमिकांची संख्या वाढत जाते. उदाहरणार्थ, जेव्हा आपण वयाने वाढतो तेव्हा आपण कोणाचेतरी ताई/दादा होतो. आपण जेव्हा अभियांत्रिकीची व्यावसायिक पदवी मिळवतो तेव्हा आपण अभियंता होतो. जेव्हा आपण व्यावसायिक अनुभवाने वाढतो तेव्हा आपण मार्गदर्शक आणि व्यवस्थापक बनतो. जेव्हा आपण निर्णय घेत मोठे होतो तेव्हा आपण पती किंवा पत्नी आणि नंतर पालक बनतो.

मी नेहमीच लोकांना असे म्हणताना ऐकले आहे की नट होणे खूप अवघड आहे. जेव्हा मी या भूमिकांकडे पाहते तेव्हा मला असे वाटते की नटाची भूमिका नाटक संपताना किंवा चित्रीकरण संपताना संपते. पण, आपली, सामान्य माणसांची, भूमिका कधीच संपत नाही. नटासाठी पात्राच्या आयुष्यातले निर्णय लेखक घेतो पण आपलं भविष्य आपली वागणूक आणि निर्णय ठरवतात. या जबाबदारीची भावना आपल्या या अनेक भूमिका निभावणं अधिक कठीण बनवू शकते. आणि त्यामुळेच आपल्याला दुसऱ्याची भूमिका सोपी वाटते.

पुढील कविता या भूमिकांविषयी आपली एक स्वतःची भूमिका मांडू इच्छिते.


चला तुम्हाला ऐकवू गोष्ट एका गावाची

एक राजा बिना राणीचा आणि राणी बिना राजाची

अनेकदा सांगितली ऐकलेली अशी ही गोष्ट आहे

नाव गाव ना ठाऊक तरीही ही सांगायची आहे

गावाचं नाव गाव आणि राजाला म्हणत राजा सगळे

नदीला जिथे म्हणतात नदी तर राणीला काय म्हणू वेगळे

या अजब गावात दोन मुलं नावाची मुलं होती

चंचल खट्याळ असली तरी मनाने फार खरी होती

एक दिवस दोघं खेळून खेळून दमून अशी बसली होती

कंटाळ्याच्या कारणाने काही नव्या शोधाची टूम होती

मी होतो राजा तू पण बनून जा राणी

दोघे मिळून सांगू मग आटपाट नगराची कहाणी

आपलं लहानपण सोडून मग दोघे राजा-राणी झाले

कामात बुडाली राणी आणि ‘राजे’ही त्यात हरवून गेले

दोघंही होती शहाणी म्हणाली उलट-सुलट होऊ

राजा होईल राणी आणि राणीला राजा म्हणू

नाव जरी बदलले तरी सुटले नाही काम

दोघांनी जाम वैतागून राडा केला सोडून लगाम

हे नाटक पाहून खरे-खरे राजा-राणी आले

दोन मुलं होण्यासाठी त्यांनी पोशाख बदलले

मुलं होऊनही त्यांच्या मस्तीला सूट अशी नव्हती

खूप ओरडा मिळायचा जर ती खोटं बोलत होती

गाव नदी हे पाहत होते त्यांना वाटे खेळ खेळावे

वेशीवर वाळले कपडे आणि नदीतटाकी जत्रा भरे

कपडे जत्रा काही असो लक्ष ठेवावे लागे

काम आपोआप होईल कसे ते करावेच लागे

सांगतात गाव नदी दोन मुलं आणि राजा राणी

ज्याचे रूप त्याच्याच वेदनेची रुळती ओठी गाणी

प्रत्येकाला आवडू लागे मग आपले स्वतःचे रूप

आश्चर्य कि मग स्वप्नी का खुणावे दुसऱ्याचे स्वरूप

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