Why Jhumpa Lahiris’ Aashima eats puffed rice in Namesake?/झुम्पा लाहिरी की आशिमा नेमसेक में मुरमुरे क्यों कहती है?/झुम्पा लाहिरीची आशिमा नेमसेकमध्ये कुरमुरे का खाते?

Original thought: English

 

Why Jhumpa Lahiris’ Aashima eats puffed rice in Namesake?

I would not call myself an avid book reader. Not now anyways. There is one unique thing that I would like to share though. I read with the characters of the book. I flow with them. I don’t have to take any efforts for flowing with them. It isn’t like I flow with one of the characters. I flow with them all, be it the protagonist or a vender who comes and goes only in one of the paragraphs. I am there with the writer, in the world that is being created by the words. That’s how I read. I cry, I laugh, I jump up and down in excitement, I slouch and I do feel everything that is happening.

Now, that I have told you how I tend to read, let us discuss Namesake. I am not going to review the book or give you the gist of it. If you feel like reading it, put in your own efforts. If you want to save your efforts, you may see the movie (it has the same name, Namesake). It would be a journey that you would have to make on your own, very similar to all the characters in the book itself.

All the members in Aashima’s family and extended family have their own journey, physical and otherwise. I loved all of their journeys. The one I remembered and cherished most was Aashima’s!!! My personal favourite. People may say but she isn’t the protagonist, her husband or her son is. I don’t want to get into the literary details of the book either. Aashima gets married and travels to America, experiences different levels of acculturation and comes back to India after she has no strings attached. That’s the journey of Aashima’s character. That’s all. It is nothing out of the box or extraordinary or something that we may not have seen or read before.

So, why am I talking about it?

The answer is acculturation.

Wikipedia defines acculturation as a process of social, psychological and cultural change that stems from the balancing of two cultures while adapting to the prevailing culture of the society. A lot of factors of acculturation are discussed. However, how many really pay attention to the small little things that we do to accommodate and adapt.

If you read the book, that is what would surprize you the most. The way Aashima copes with the whole new western culture is so subtle and reassuring that I simply cannot forget the way she rushes to eat puffed rice when she is either missing India or is stressed.

India is such a diverse country that by travelling even a little bit you reach a place where language, culture, food, clothing style, working style, weather and the whole context itself changes. When I encounter such change, I am mostly awed and amazed.

It is not that I didn’t know the acculturation process earlier. However, I have noticed this trend in my own behaviour. When I visit new places, I don’t go and eat puffed rice but I certainly cook or find something that is the closest to my own home context.

So, what do you people do when you want to simply feel like home???

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मूल विचार: अंग्रेजी

 

झुम्पा लाहिरी की आशिमा नेमसेक में मुरमुरे क्यों कहती है?

मैं अपने आप को बहुत बड़ी पुस्तकें पढ़नेवाली तो नहीं कहूँगी। आजकल तो वैसे भी नहीं। हालांकि एक अनोखी बात है जो मैं साझा करना चाहूंगा। मैं किताब के पात्रों के साथ उनकी कथा पढ़ती हूँ। मैं उनके साथ बहती हूँ। मुझे उसके लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता। ऐसा नहीं है कि मैं किसी एक पात्र के साथ कहानी में पढ़ती हूँ। मैं उन सभी के साथ बहती जाती हूँ, चाहे वह नायक हो या कोई चीजें बेचनेवाला हो जो केवल एक ही प्रहसन में आकर जाता है। मैं वहां लेखक के साथ कड़ी हूँ, जो अपने शब्दों से दुनिया बुन रहा है। मैं ऐसेही पढ़ती हूँ। मैं रोती हूँ, हँसती हूँ, उत्साह से ऊपर-नीचे कूदती हूँ, उदास होती हूँ और वो सब कुछ महसूस करती हूँ जो कहानी में हो रहा हैं।

अब जब मैंने आपको बताया है कि मैं कैसे पढ़ती हूँ, आइए हम “नेमसेक” पर चर्चा करें। मैं पुस्तक की समीक्षा नहीं करना चाहती और न ही आपको इसकी कहानी बताउंगी। यदि आप पढ़ना चाहें, तो खुद ही कोशिश करें। यदि आप अपने प्रयासों को बचाना चाहते हैं, तो आप फिल्म देख सकते हैं (इसका नाम वही हैं, “नेमसेक”)। यह यात्रा आपको खुद को ही तय करनी होगी, पुस्तक के सभी पात्रों के जैसे।

आशिमा के परिवार की और सगे-संबंधियों की अपनी एक यात्रा हैं, भौतिक और अन्य किस्म की भी। मुझे उन सबकी सारी यात्राएँ बहुत अच्छी लगीं। मुझे जो सबसे ज्यादा पसंद आयी और याद रही वो हैं आशिमा की यात्रा !!! लोग कह सकते हैं लेकिन वह नायक नहीं है, उसका पति या उसका बेटा है। मैं पुस्तक के साहित्यिक विवरण में नहीं पड़ना चाहती। आशिमा शादी कर अमेरिका चली जाती है, विभिन्न स्तरों के सांस्कृतिक संक्रमण का अनुभव करती है और जब उसका वहाँ रहने कारण नहीं रहता वो वापस भारत लौट आती है। यह आशिमा की यात्रा है। बस इतना ही। इसमें कुछ भी अनोखा या असाधारण या नहीं की  जो कभी न देखा या पढ़ा हो।

तो, मैं इसके बारे में क्यों बात कर रही हूँ?

जवाब है सांस्कृतिक संक्रमण।

विकिपीडिया सांस्कृतिक संक्रमण की परिभाषा ऐसे करता हैं: सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक परिवर्तन की प्रक्रिया जिसमें समाज के प्रचलित संस्कृति से अनुकूल होते हुए दो संस्कृतियों में संतुलन बनाने के प्रयास मौजूद है। सांस्कृतिक संक्रमण के कई कारकों पर चर्चा की गई है। हालाँकि, हम कितनी छोटी छोटी चीजों पर ध्यान देते हैं, जो परिवर्तन के इस यात्रा में समाविष्ट हैं।

किताब पढ़ते वक़्त वही सबसे अधिक अचरज की बात हैं। जिस तरह से आशिमा ने पूरी तरह से नई पश्चिमी संस्कृति का सामना किया है, उसका अनुभव इतना सटीक और आश्वस्त करने वाला है कि मुझे बार बार उसका तनाव के वक़्त और भारत की याद आनेपर दौड़कर मुरमुरे खाने के लिए जाना याद आता हैं।

भारत एक ऐसा विविधतापूर्ण देश है जहाँ थोड़ी सी यात्रा करके भी आप एक ऐसी जगह पर पहुँच जाते हैं जहाँ भाषा, संस्कृति, भोजन, परिवेश, कार्य शैली, मौसम और सभी सांस्कृतिक संदर्भ बदल जाते हैं। जब मैं इस तरह का अलगाव पाती हूँ तो मैं अचरज से हैरान हो जाती हैं।

ऐसा नहीं है कि मुझे पहले सांस्कृतिक संक्रमण के विषय में जानकारी नहीं थी। हालाँकि, मैंने यह खुदके व्यवहार में देखा है। जब मैं नई जगह जाती हूँ, तो मैं भागकर मुरमुरे नहीं खातीं लेकिन कुछ खुद पकाती हूँ और अपने घर के साथ, संस्कृति के साथ कुछ मेल खानेवाला जरूर ढूंढती हूँ।

तो नई जगह पर घर जैसा महसूस करने के लिए आप क्या करते हैं ???

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मूळ विचार: मराठी

 

झुम्पा लाहिरीची आशिमा नेमसेकमध्ये कुरमुरे का खाते?

मी स्वत: ला काही फार उत्साही वाचक म्हणू शकत नाही. सध्या तर नाहीच. पण एक वेगळीशी गोष्ट सगळ्यांना सांगावीशी वाटली. मी पुस्तक वाचताना पात्रांबरोबर वाचते आणि गोष्टींबरोबर वाहते. मला काही विशेष प्रयत्न करावे लागत नाही. मी कुठल्या एका पात्रासोबत प्रवास करते असं नाही तर सगळ्यांबरोबर वाहत असते. मग पात्र मुख्य असो वा एखाद्या परिच्छेदात येऊन जाणारा एखादा विक्रेता. मी लेखकाबरोबर असते जो शब्दांनी जग विणत असतो. मी तसंच वाचते. मी रडते, हसते, उत्साहाने खालीवर उड्या मारते, मी उदास होते आणि जे जे काही होत असतं ते अनुभवत असते.

आता मी कसं वाचते हे सांगून झालंय तर आता नेमसेक विषयी बोलू. मी पुस्तकाची समीक्षा करणार नाही किंवा सारांश देणार नाही. जर वाचायचे असेल तर तुम्हाला वाचावं लागेल. नाहीतर त्याच नावाचा चित्रपट पहा. पुस्तकातील इतर पात्रांप्रमाणेच तो प्रवास तुमचा तुम्हाला करावा लागेल.

आशिमाच्या कुटुंबाला आणि नातेवाईकांना आपापल्या भौतिक आणि इतरही यात्रेतून जावे लागते. मला त्या सगळ्यांना प्रवास आवडतो. त्यातल्या त्यात  आशिमाचा सर्वात जास्त. तो जास्त लक्षातही राहतो!!! कोणी म्हणेल नायक ती नव्हे तर तिचा नवरा किंवा मुलगा आहे. मला पुस्तकाचं साहित्यिक समालोचन नाही करायचं. आशिमा लग्न करून अमेरिकेत जाते आणि सांस्कृतिक संक्रमणाच्या वेगवेगळ्या स्तरांतून जाते. नंतर कुठलेही बंध न राहिल्याने परत येते. हि आशिमाची गोष्ट आहे. हे काही जगावेगळं, पूर्वी न पाहिलेलं असं नाही. काहीच नावीन्यपूर्ण नाही.

तर, मी याबद्दल का बोलत्येय?

उत्तर सांस्कृतिक संक्रमण हे आहे.

विकिपीडिया म्हणतं: सामाजिक, मानसिक आणि सांस्कृतिक बदलाच्या प्रक्रिये जे समाजाच्या प्रचलित संस्कृतीशी जुळवून घेताना दोन संस्कृतींचे संतुलन साधले जाते ते सांस्कृतिक संक्रमण. इथे अशा संक्रमणाच्या बऱ्याच घटकांवर चर्चा होते. पण अशा वेळी संस्कृतीत मिसळून जाताना होणाऱ्या लहान लहान गोष्टींकडे लक्षंच देत नाही.

पुस्तक वाचल्यावर तुम्हाला याच लहान लहान गोष्टी चकित करून जातील. आशिमा संपूर्ण नवीन पाश्चिमात्य संस्कृतीशी जुळवून घेण्याचा मार्ग इतका बारकाईने टिपला आहे आणि आश्वासक आहे की तणावाच्या क्षणी आणि भारताची आठवण आल्यावर तिने चुरमुरे खाण्यासाठी धावणं आपण विसरू शकत नाही.

भारत एक असा विविधतापुर्ण देश आहे ज्यात थोड्या अंतराने देखील भाषा, संस्कृती, अन्न, वेशभूषा, कार्यप्रणाली, हवामान आणि जगण्याचा संपूर्ण संदर्भ बदलून जातो. अशी विविधता दिसल्यावर मी आश्चर्याने हरवून जाते.

मला सांस्कृतिक संक्रमणाविषयी नक्कीच आधीपासून ठाऊक होतं. पण मला हे स्वतःच्या वागण्यातही जाणवलं. मी काही नवीन जागी गेल्यावर चुरमुरे खात नाही पण मी काहीतरी बनवते आणि माझ्या संस्कृतीची सय येईल असं काहीतरी करते.

तर तुम्हाला घरासारखं वाटावं म्हणून तुम्ही काय करता???

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