Two authors/दोन लेखक/दो साहित्यिक

Original thought: Marathi


Two authors

Today, I am going to talk about two of my favourite books and, in turn, of their writers: G N Dandekar and Paulo Coelho.

Of the two, G N Dandekar introduced me to the best of Marathi literature and Paulo Coelho to the best of English literature. How I got introduced to both of these authors is a story for some other time.

G N Dandekar was born on 8th July, 2016, in Amravati, Maharashtra, and passed away on 1st June, 1998. Whereas Paulo Coelho was born on 24th August, 1947, in Rio de Janeiro, Brazil, and he is currently 71 years old.

Today, I am going to talk about “Anandvanbhuvan” by G N Dandekar and “The Zahir” by Paulo Coelho. This is simply one of my reading experiences. I am not writing this to criticize anything or anyone. This is at most an incomplete and amateur attempt to understand these two novels.

First, let’s talk about both the novels. We can call both of them love stories, but they are not bound by any definition in terms of the subject matter they cover. The male protagonist of “Anandvanbhuvan” is a farmer. The female protagonist is a homemaker, and the story takes place in a few villages in Maharashtra. On the other hand, the male protagonist of “The Zaheer” is a writer. The female protagonist is a war journalist, and the story travels around few of the countries.

Both female protagonists are strong women with clear thought process. Whereas the characters of the male protagonist are different. The male protagonist in “Anandvanbhuvan” respects the set boundaries with all his heart and is aware. The male protagonist of “The Zaheer” is confused all the time. Despite the similarities and differences, both these stories move towards finding oneself and strengthening relationships.

Both the stories look at the shortcomings of society objectively. One of them looks at the structure and the outer shell of the society and how it impacts the individual. Whereas the other attempts to understand the unseen psychological framework of the society and points at the elements of the society that consider this framework to be obsolete.

While reading both the stories, I kept wondering whether the writer would talk about destroying the existing structure of the society or he would talk about slowly and gradually composing and mending everything around us. Both the stories talk about marriage as an institution and conclude at the point of the birth of a child. For me, this signified hope, love and new beginnings. However, it is not only the birth of a new generation, but more than that, in one story, a couple suffering from leprosy give away their legitimate child so that it could be cared for. In the other, the couple decides to raise together a child that is so called, illegitimate.

Now, why am I retelling all this here? Both the stories and authors have no connection with each other. The stories take place in completely different situations. Still, they talk about the shortcomings of the society in a matter-of-fact manner. They highlight the fact that despite the changing times and situations, the human need to find the answer for “Who am I?” never changes. Furthermore, they talk about the longing of human beings to cultivate and strengthen relationships. While doing so, they don’t forget to mention that human beings are ready to pay any price for this.

In a nutshell, both authors tell us that humanity is bigger and higher than everything. They don’t cower or hesitate to tell the truth that they have realised and witnessed. While reading both the stories, I continuously kept feeling that though everything around us changes, human beings are simply human beings, and humanity is their true essence.


मूळ विचार: मराठी


दोन लेखक

आज मी माझ्या आवडत्या दोन पुस्तकांविषयी आणि पर्यायाने त्यांच्या लेखकांविषयीही लिहिणार आहे. गो नी दांडेकर आणि पाउलो कोएलो.

यापैकी गो. नी. दांडेकरांनी माझी उत्तम मराठी वाङ्मयाशी ओळख करून दिली आणि पाउलो कोएलो यांनी इंग्रजी वाङ्मयाशी! आता ही ओळख कशी झाली याची गोष्ट पुन्हा केव्हातरी सांगेन.

गो. नी. दांडेकर यांचा जन्म ८ जुलै १९१६ ला अमरावती, महाराष्ट्रात झाला आणि १ जून १९९८ रोजी ते निवर्तले. तर पाउलो कोएलो यांचा जन्म २४ ऑगस्ट १९४७ ला रिओ डी जानेरो ब्राझील मध्ये झाला आणि ते सध्या ७१ वर्षांचे आहेत.

मी आज गो. नी. दांडेकरांचे “आनंदवनभुवन” आणि पावलो कोएलोच्या “द जाहीर” विषयी लिहिणार आहे. हा केवळ मला आलेला एक अनुभव आहे.  हा कुठल्याही गोष्टीवर टीका करण्याचा उद्देश नसून या दोन्ही कादंबऱ्या समजून घेण्याचा माझ्यापुरता अपुरा, भाबडा प्रयत्न आहे.

प्रथम थोडं कादंबऱ्यांविषयी लिहिते. दोन्हीही प्रेमकथा आहेत असं म्हणता येईल. पण त्यांचा आवाका मात्र कुठल्याच व्याख्येला बांधील नाही. आनंदवनभुवनाचे नायक शेतकरी, नायिका गृहिणी आणि कथा महाराष्ट्रातल्या काही गावातली, तर “द जाहीर” चा नायक लेखक, नायिका युद्धभूमीतील वार्ताहार आणि कथा जगातल्या काही देशात घडते. दोन्ही गोष्टीत नायिका अधिक खंबीर आणि विचार अगदी सुस्पष्ट करणारी. पण दोन्ही गोष्टींचे नायक अगदी भिन्न. आनंदभुवनचा नायक पराकोटीचा मर्यादाशील आणि सजग, तर द जाहीर नायक सदा गोंधळलेला. असे साम्यभेद असूनही दोन्हीही गोष्टींचा प्रवास अगदी चौघांचाही स्वत्व शोधण्याकडे आणि नातं टिकवण्याकडे होताना दिसतो.

दोन्हीही गोष्टी समाजाच्या व्यंगाकडे त्रयस्थपणे पाहतात. एक गोष्ट समाजाच्या रचनेकडे, बाह्यअंगाकडे आणि त्याच्या वैयक्तिक जीवनावर होणाऱ्या परिणामांकडे पाहते. तर दुसरी गोष्ट समाजाच्या न दिसणाऱ्या मानसिक चौकटीकडे आणि या चौकटीला अपरिहार्य समजणाऱ्या समाजाच्या घटकांकडे आपली नजर वळवते. दोन्ही गोष्टी वाचताना मला वाटत राहिलं की लेखक समाजव्यवस्था उलथून टाकण्याची भाषा करेल की सजगपणे हळूहळू सगळं सावरण्याची!? दोन्ही गोष्टी मुलाच्या जन्मावर संपतात. मला याचा अर्थ असा लागला की आशा, प्रेम आणि नवीन सुरुवात अधोरेखित करण्यासाठी असं योजलं असेल. कारण फक्त नवीन पिढीचा जन्म नाहीये हा! एका गोष्टीत कुष्ठरोगी जोडपं आपलं औरस मुल सांभाळण्यासाठी दुसऱ्याच्या स्वाधीन करतात, तर दुसऱ्या गोष्टीतील जोडपं पोटात वाढणारं तथाकथित अनौरस मुल एकत्र वाढवायचं ठरवतात.

आता या गोष्टी इथे मांडण्याचं कारण सांगते. या दोन्ही गोष्टी आणि त्या लिहिणारे लेखक यांचा एकमेकांशी काहीही संबंध नाही. त्या गोष्टी खूप वेगळ्या परिस्थितीत घडतात. तरीही समाजाच्या समाजपणाच्या उणिवा अगदी सहज व्यक्त करतात. भलेही काळ आणि परिस्थिती वेगळी असेल, पण माणसाचा स्वत्वशोध बदलत नाही हे सांगून जातात. त्याच्याही खूप पुढे जाऊन माणसाची नातं जपण्याची, टिकवण्याची ओढ अधोरेखित करता करता माणूस यासाठी केवढी मोठी किंमत मोजायला तयार होऊ शकतो हेही सविस्तर सांगितल्याशिवाय राहत नाहीत.

अगदी थोडक्यातच सांगायचं झालं तर दोन्ही लेखक माणूसपणा हा बाकी सगळ्या गोष्टींपेक्षा मोठा असतो असं सांगतात. आणि कुठेही त्यांच्या मनाला पटलेलं सत्य मांडायला घाबरत, कचरत नाहीत. या कलाकृती वाचताना, अनुभवताना एवढंच सारखं जाणवत राहतं, की शेवटी सगळं काही बदललं तरी माणूस माणूसच असतो आणि माणूसपण हाच त्याचा खरा स्वभाव असतो.


मूल विचार: मराठी


दो साहित्यिक

आज मैं मेरे पसंदीदा दो किताबों के और उनके लेखकों के विषय में कुछ बयान करना चाहती हूँ। गो. नी. दांडेकर और पाउलो कोएलो। इनमेंसे गो. नी. दांडेकरजीने मेरी पहचान अतिउत्तम मराठी साहित्य से करवाई और पाउलो कोएलोने अंग्रेजी साहित्य से। अब यह पहचान कैसे हुई इसकी कहानी फिर कभी बताऊंगी।

गो. नी. दांडेकरजी का जन्म ८ जुलाई १९१६ को अमरावती महाराष्ट्रमें हुआ और १ जून १९९८ को वह चल बसे। पाउलो कोहेलोजी का जन्म २४ अगस्त १९४७ को रियो डी जनेरो, ब्राजील में हुआ और वह फिलहाल ७१ साल के हैं।

मैं आज गो. नी. दांडेकरजी के “आनंदवनभुवन” और पाउलो कोहलोजी के  “द जाहिर” के बारे में लिखूंगी। यह मुझे आई हुई एक अनुभूति है। किसी भी चीज पर टिप्पणी करने का यहां कोई उद्देश्य नहीं। यह तो सिर्फ मेरा यह दोनों साहित्यिक रचनाओं को समझने का अधूरा-सा, साधारण प्रयास है।

पहले थोड़ा सा इनकी कथा के बारे में लिखना चाहूंगी। दोनों कथाओं को प्रेमकथा कहां जा सकता है। परंतु उनका दायरा किसी भी व्याख्या का बंदिश का मोहताज नहीं। “आनंदवनभुवन” का नायक किसान, नायिका घर में काम करने वाली और कथा महाराष्ट्र के गांव में घटती है। और “द जाहिर” का नायक लेखक, नायिका युद्ध भूमि में जानेवाली पत्रकार और कथा विश्व के कुछ देशों में घटती है। दोनों कथा में नायिका अधिक मजबूत और सटीक विचार करनेवाली किंतु दोनों कथा के नायक बहुत ही अलग। “आनंदवनभुवन” का नायक मर्यादाओं का मान रखनेवाला और जागृत और “द जाहिर” का नायक सदा ही असमंजस में फंसा हुआ। ऐसी समानता-असमानता होने पर भी दोनों कथाओं की यात्रा सभी चारों की अपने आप को खोजने की तरफ और रिश्तो को बनाए रखने की तरफ होते हुए दिखती है।

दोनों ही कथाएं समाज की कमियों की तरफ एक तीसरी व्यक्ति के नजर से देखती है। एक कथा समाज के रचना की ओर यानी समाज के बाहरी प्रारूप की ओर और उसके व्यक्ति के जीवन पर होने वाले परिणामों को देखते हैं। दूसरी कथा समाज के न दिखने वाले अंदरुनी सीमाओं की तरफ और इन सीमाओं को बहुत ज्यादा महत्व देने वाले समाज के विभिन्न घटकों की ओर हमारा ध्यान खींचती है।

दोनों ही कथाए पढ़ते हुए मुझे लग रहा था कि क्या लेखक समाज व्यवस्था को तोड़-मरोड़नेकी सोचेगा या फिर धीरज से धीरे धीरे सब कुछ सवारने की? दोनों ही कथाएं विवाह की रीति पर संस्थापक अपने विचार प्रकट करती है। दोनों ही कथाएं बच्चे के जन्म पर खत्म होती है। मुझे इस समाप्ति का अर्थ ऐसा लगा कि शायद लेखक ने आस, प्रेम, नई शुरुआत को महत्व देने के लिए ऐसी योजना की हो। क्योंकि यह केवल एक नए पीढ़ी का जन्म नहीं है। एक कथा में कुष्ठरोग से पीड़ित एक दांपत्य अपना जायज बच्चा संभालने के लिए दूसरे के हवाले करते है। ऐसेही दूसरी कथा में एक दांपत्य पेट में पलने वाला समाज की नजर में नाजायज बच्चा साथ में बड़ा करने का फैसला लेते है।

अभी इन कथाओं को यहाँ प्रस्तुत करने का कारण बताती हूँ। यह दोनों कथाएं और उन्हें लिखने वाले लेखकोंका एक-दूसरे से कुछ भी संबंध नहीं है। यह दोनों कथाएं बहुत ही विभिन्न परिस्थितियों में घटती है। फिर भी समाज के समाज होने की कमियां बड़ी सहजता से सामने रख देती है। समय और परिस्थिति भले ही अलग-अलग हो, परंतु इंसान की अपने अपनत्व की खोज कभी नहीं बदलती यही यह कथाएं बयां करती है। उससे भी बहुत आगे जाकर इंसान की रिश्ते संजोने की, उन्हें संभालने की इच्छा और मनीषा बताते हुए इसके लिए इंसान कितनी बड़ी कीमत अदा करने को तैयार हो सकता है यह भी बड़े-ही विस्तार से कहे बिना नहीं रुकती।

अगर कम शब्दों में कहना चाहूँ, तो दोनों ही लेखक इंसानियत का गुण बाकी सब चीजों से बड़ा होता है यही बताते रहते हैं और उनके मन में जिसका साक्षात्कार हुआ है ऐसा सत्य बताने को घबराते और जीझकते नहीं। यह दोनों कलाकृतियों को पढ़ते हुए, अनुभव करते हुए, हर पन्ने पर यही महसूस होता है कि चाहे सब कुछ बदल जाए इंसान बस इंसान ही रहता है और इंसानियत ही उसका मूल स्वभाव है।






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