Something/कोई बात/काहीतरी

Original thought: Marathi

 

Something

Sometimes a book from my book shelf makes me come near it as if it is it is a human being calling me by my name. More than me, the book is aware that, in this moment, I need it. The book does not stop after calling me once! It waits and keeps calling me without getting tired or bored till I do not walk up to it and lift it. I habitually caress the front cover of the book. I wipe away the dust, if there is any. Then, I open the book. I never know what I am supposed to be reading at that particular moment. Sometimes I become my stubborn self and start reading from the first page of the book. When I do this, the book gets irritated. It does everything in its power to make me reach the lines and words I’m supposed to reach. In its efforts, sometimes, the wind becomes the accomplice of the book or sometimes it is my own haphazard handling of the book. Once I reach the words, the rest of the magic is done by the words themselves! They don’t need anything else! These words console me, compose me, control me, caress me, engulf me!! The words bind me to themselves in such a way that I am free!!!! Calm and stable!

In some such magical moments, I stumbled upon the following words by the famous poet Gulzar and I found my serenity in them. (Original poem: Hindi)

 

This road is not easy

The road on which leaving my hand, you

Have started walking all alone

With the fear of the probability of you getting lost

I have made the poems wait at every turn

If you feel tired

And if you feel the need

Grab the finger of one of the poems and come back

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मूल विचार: मराठी

 

कोई बात

जैसे कभी कोई नाम पुकार कर बुलाता है, वैसे ही कभी कबार कोई किताब मुझे बुला लेती है। मुझसे कहीं ज्यादा उसे ही ख्याल होता है, कि इस पल मुझे उसकी जरूरत है। वह किताब एक बार पुकार कर रुकती नहीं। जब तक मैं वह पुकार सुनकर उस विशिष्ट किताब तक जाकर वह हाथ में ना लूं, तब तक वह पुकारती रहती है। बिना थके। मैं आदत से उसके कवर पर अपना हाथ फेरती हूं। अगर कोई धूल दिख गई, तो उससे झटक लेती हूं। फिर किताब खोलती हूं। उस पल में मुझे क्या पढ़ना चाहिए यह मुझे कभी पता ही नहीं होता। कभी कबार मैं हठ से अनुक्रम के अनुसार पढ़ने लगती हूं। तब शायद किताब को गुस्सा आता है। क्योंकि वह कुछ ना कुछ वजह खोज कर मुझे अपनी मनचाही लाइनों तक, शब्दों तक पहुंचा ही देती है। जैसे हवा पर कोई पर उड़ कर अपनी मंजिल तक पहुंच जाए। इन प्रयासों में कभी किताब का साथी पवन होता है, तो कभी मेरा पागलपन। एक बार जो मैं शब्दों तक पहुंच गई, तो आगे की जादू तो शब्द ही करते हैं। उन्हें और किसी की जरूरत नहीं। यह शब्द मुझे समझाते हैं, सवारते हैं, रोकते हैं, टोकते हैं, चलाते हैं और अपने में समा लेते हैं। मुझे यह शब्द उनमें बांधकर सबसे ज्यादा स्वतंत्र और मुक्त कर देते हैं। शांत और स्थिर।

ऐसे ही कुछ अनोखे पलों में मैं गुलजार जी के नीचे दिए गए शब्दों पर जा अटकी और वहीं मैंने शांति का आभास किया।

 

यह राह बहुत आसान नहीं

जिस राह पे हाथ छुड़ाकर तुम

यू तन तन्हा चल निकली हो

इस खौफ से शायद राह भटक जाओ न कहीं

हर मोड़ पर मैंने नज़्म खड़ी कर रखी है

थक जाओ अगर

और तुम को जरूरत पड़ जाएं

एक नज़्म की उंगली थाम के वापस आ जाना

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मूळ विचार: मराठी

 

काहीतरी

कोणी साद घालावी तसं एखादं पुस्तक मला बोलावून घेत कधी कधी. माझ्यापेक्षा त्यालाच जाणीव असते की या क्षणी मला त्याची गरज आहे. ते पुस्तक एकदा साद घालून थांबत नाही. मी ती साद ऐकून त्या विशिष्ट पुस्तकापाशी जाऊन ते हातात घेईपर्यन्त ते बोलावत राहतं, अगदी न कंटाळता. मी त्याच्या मुखपृष्ठावरून मायेने हात फिरवते. जमलीच असेल धूळ तर ती झटकून टाकते. मग पुस्तक उघडते. त्याक्षणी मी काय वाचायला हवं हे मला माहीत नसतंच! कधीकधी मी हट्टाने अगदी पानांबरहुकूम वाचू लागते. मग पुस्तक वैतागतं. काहीतरी कारण काढून मला त्याला हव्या त्या ओळी पर्यंत शब्दांपर्यंत नेऊन सोडतं. अगदी अलगद! या प्रयत्नात कधी वारा पुस्तकाला सहाय्यभूत होतो, तर कधी माझा धांदरटपणा! एकदा मी शब्दांपर्यंत पोहोचले ही पुढची जादू शब्दच करतात. त्यांना इतर कशाचीही गरज नसते. हे शब्द मला समजावतात, सावरतात, आवरतात, गोंजारतात आणि सामावूनही घेतात. मला स्वतःला अडकवून घेत संपूर्ण मुक्त करतात. शांत आणि स्थिर!!

अशाच काही भारलेल्या क्षणी मी गुलजारांच्या खालील शब्दांना अडखळून थांबले आणि विसावले होते. (मूळ कविता: हिंदी)

ही वाट फार सोपी नव्हे

ज्या वाटेवर हात सोडवून तू

अशी एक एकटी चालू पडली आहेस

या भितीने कदाचित वाट चुकणार नाहीस ना कुठे

प्रत्येक वळणावर मी कविता उभी करून ठेवलीये

थकून गेलीस जर

आणि तुला गरज पडली

एका कवितेचं बोट धरून परत निघून ये

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