My Angel/मेरी परी/माझी परी

IMG-20181205-WA0013Original thought:

 

My angel

Some things come to our life as a surprise. This is my journey of living the surprise. People may call it serendipity or God or a wish come true. Whatever it is, I am loving it.

One day, I received a call from my former student’s mother about re-starting our sessions. I was apprehensive but I cared for my student too much to say No. So, now, I had to travel everyday to my student’s house to help her with studies.

I live approximately 2 kilometres from my student’s house. The easiest option for me to reach her house is to take an auto. That seems easy enough. Take an auto while going and coming back. Not difficult at all. But like always, reality is different from the theoretical world. Not all auto drivers agree to take you from east to west. My sessions are in the evening and that is the time the traffic is also at its peak. I was dreading all this. I had experienced this earlier.

I started thinking. What could I do to solve my problem? It seemed like I was okay with taking a session but not the travelling. Then, a thought arose. What if I used a cycle to travel… What if… What if… It got me thinking about even more things. The first and the foremost was—I do not have a bicycle. Shall I buy a bi-cycle? That would be too expensive. If I don’t use it, I would be really sad and sorry. So, what could I do? Then, a voice inside me reminded me of the principle I had recently started following—sustainability! Yes!! What if I could borrow a bicycle… I kept thinking and wondering about this. Then, one day, I posted my wish to borrow a bicycle. I thought, in worst case scenario, no one would notice the post and I would have to find other means to borrow a bike. Or I may have to simply use an auto. But I would be happy that I tried.

I did not have to wait long for an answer. A friend I had not met for 4-5 years replied saying that I can borrow her bicycle. With a few calls and messages, I not only got a bicycle but I got to reconnect to my friend.

I named her Angel because my first bicycle was named Angel. I sensed the same spirit and same love from here.

Now, the question was would my dream of riding a bicycle everyday be a reality?

Frankly, it is more than reality.

Here, I am listing the advantages of using a bicycle for that 2 kilometres of commute 4 days of a week.

  • I save the money I would have otherwise spent on auto fare.
  • It helps me build some stamina. I climb up a bridge which is quite steep.
  • It is a healthy way to travel.
  • It saves my time. I don’t have to wait for an auto to take me. I also get to go ahead in traffic.
  • I get to connect to a machine. They say machines stay better when they are in constant use.
  • I must be saving a few litres of petrol as I do not use an auto. This is good for the environment.

There are two distinct experiences I would want to share here.

One

One day while coming back home on my bike, I sensed someone looking at me. It was a driver of the car which was beside my bicycle. He kept looking at me. He was quite creepy. I felt disgusted. I waited and let him go ahead.

There are a lot of food delivery guys who use a bicycle. They all stared at me. I didn’t ask them why. Maybe I should…

I learnt a lesson. Creepy people are everywhere and you have to deal with them!!!

Two

Thanks to the numerous potholes, I fell down from my bicycle one day. There was a lady taking her evening walk, who helped Angel get up. I got up on my own. Angel wasn’t hurt but I had 3-4 bruises. I realised that the chain needed to be fixed. I was fixing it myself when a random stranger stopped and did it for me. I went home. Almost a week later, I was coming back by the same road. I saw the lady who had helped me. I stopped. She said her name was Aparna. She recognized me immediately. She told me that she loved the fact that there was a woman cycling. She told me that she was proud and empowered. I learnt another lesson. Angel wasn’t only my angel. She was an angel in herself.

Could it get any better?

Angel says, “Yes. Just wait and watch.”

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मूल विचार: इंग्रजी

 

मेरी परी

कुछ चीजें हमारे जीवन में अचानकसे आती हैं। यह मेरी वह आश्चर्य को जीने की यात्रा है। लोग इसे संजोग या ईश्वर या इच्छापूर्ति कह सकते हैं। जो भी हो, मैं बहुत खुश हूँ।

एक दिन, मुझे अपने पूर्व छात्र की मां ने फोन किया यह कहते हुए की सेशन फिर शुरू करेंगे। मैं थोडीसी हिचकिचा रही थी लेकिन मैंने अपने छात्र के बारे में सोचते हुए मैंने हाँ भरी। अब उसके घर रोजका जाना-आना होना ही था।

मैं अपने छात्र के घर से लगभग 2 किलोमीटर की दुरी पर रहती हूँ। मेरे लिए उसके घर पहुँचने का सबसे आसान विकल्प एक ऑटो लेना है। यह काफी आसान लगता है। जाते समय और वापस आते समय एक ऑटो कर लें। मुश्किल बिल्कुल नहीं। लेकिन हमेशा की तरह, वास्तविकता सैद्धांतिक दुनिया से अलग ही होती है। सभी ऑटो चालक आपको पूर्व से पश्चिम की ओर ले जाने के लिए राजी नहीं होते। मेरे सेशन शाम को होते हैं और यही वह समय है जब यातायात भी अपने चरम पर होती है। इसका अनुभव मुझे पहले भी हुआ था। इसका थोड़ा डर भी था।

मैं सोचने लगी थी। मैं क्या कर सकती हूँ? ऐसा लग रहा था कि सेशन लेने से ज्यादा ये आना-जाना तकलीफदेय था। फिर, एक विचार उत्पन्न हुआ। क्या होगा अगर मैं साइकल चलाकर गई? तो… तो… तो… इसने मुझे और भी अधिक चीजों के बारे में सोचने पर मजबूर किया।

पहला और सबसे महत्वपूर्ण था- मेरे पास साइकिल नहीं है। क्या मैं एक साइकल खरीद लूँ? यह बहुत महंगा होगा। अगर मैं इसका उपयोग नहीं करुँगी, तो मैं वास्तव में दुखी होकर खेद की भावना से भर जाउंगी। तो, मैं क्या कर सकती थी? फिर, मेरे अंदर की आवाज ने मुझे उस सिद्धांत की याद दिला दी जो मैंने हाल ही में अपनाया था – संधारणात्मक विकास! हाँ!! क्या मैं एक साइकिल उधार ले सकती हूँ… मैं इस बारे में सोचती रही। फिर, एक दिन, मैंने साइकिल उधर लेने की अपनी इच्छा पोस्ट की। मैंने सोचा, सबसे बुरा क्या होगा की कोई भी पोस्ट नहीं देखेगा और मुझे साइकल उधार लेने के लिए अन्य साधन खोजने होंगे। या मुझे बस ऑटो का उपयोग करना पड़ सकता है। लेकिन मुझे खुशी होगी कि मैंने कोशिश की।

मुझे जवाब के लिए ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा। एक दोस्त जो मुझे 4-5 साल से नहीं मिली थी, उसे ने कहा कि मैं उसकी साइकल उधार ले सकती हूँ। कुछ कॉल और संदेशों के साथ, मुझे न केवल एक साइकल मिली, बल्कि मुझे अपने दोस्त से फिरसे जुड़ने का मौका मिला।

मैंने उसका नाम परी रखा क्योंकि मेरी पहली साइकल का नाम परी था। मुझे इससे भी उसी भावना और उसी प्यार की अनुभूति हुई।

अब, सवाल यह था कि क्या हर रोज़ साइकिल चलाने का मेरा सपना सच होगा?

सच कहूँ तो यह वास्तविकता से परे एक अनुभव था।

यहाँ, मैं सप्ताह के 4 दिन 2 किलोमीटर के आवागमन के लिए साइकल के उपयोग करने के लाभों को सूचीबद्ध कर रही हूँ।

1) मैं ऑटो भाड़े पर खर्च किए गए पैसे बचा लेती हूँ।

2) यह मुझे कुछ सहनशक्ति बढ़ाने में मदद करता है। मैं एक पुल पर चढ़ती हूँ।

3) यह यात्रा करने का सबसे स्वस्थ तरीका है।

4) यह मेरा समय बचाता है। मुझे ऑटो का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। मुझे ट्रैफिक में भी आगे जाने मिलेगा।

5) मुझे एक मशीन से जुड़ने का अवसर मिलेगा। वे कहते हैं कि जब एक यंत्र निरंतर उपयोग में होता हैं तो वो बेहतर रहता हैं।

6) मुझे कुछ लीटर पेट्रोल बचाने का मौका मिलेगा क्योंकि मैं ऑटो का उपयोग नहीं कर रही हूँ। यह पर्यावरण के लिए अच्छा है।

दो अनुभव हैं जो मैं यहां साझा करना चाहता हूं।

एक

एक दिन अपनी साइकल पर घर वापस आते समय, मुझे कोई देख रहा था। यह मेरी बाजूवाली कार का ड्राइवर था जो मेरी साइकिल के पास थी। वह मुझे देखता रहा। वह काफी असहनीय था। मुझे घृणा महसूस हुई। मैं रुक गई और उसे आगे जाने दिया।

बहुत सारे खाद्य वितरण करने वाले लोग हैं जो साइकिल का उपयोग करते हैं, वे सभी मुझे घूरते रहते हैं। मैंने उनसे “ऐसा क्यों” ये नहीं पूछा? शायद मुझे पूछना चाहिये…

मैंने एक सबक सीखा। असहनीय लोग हर जगह हैं और आपको उनसे निपटना होगा !!!

दो

कई गड्ढों की बदौलत मैं एक दिन अपनी साइकिल से गिर गई। एक महिला अपनी शाम की सैर कर रही थी, जिसने परी को उठने में मदद की। मैं अपने आप उठ गई। परी को चोट नहीं आई लेकिन मुझे 3-4 चोटें आईं। मुझे महसूस हुआ कि परी के चेन को ठीक करने की जरूरत है। मैं इसे खुद ठीक कर रही थी जब एक अजनबी ने मुझे रोका और उसे ठीक किया। मैं घर आई। लगभग एक हफ्ते बाद, मैं उसी सड़क से वापस आ रही थी। मैंने उस महिला को देखा जिसने मेरी मदद की थी। मैं रुक गई। उसने कहा कि उसका नाम अपर्णा है। उसने मुझे तुरंत पहचान लिया। उसने मुझे बताया कि उसे नाज़ हैं कि एक महिला साइकिल चला रही थी। उसने मुझे बताया कि वह गर्व और सशक्तता का अनुभव करती हैं।

मैंने एक और सबक सीखा। परी केवल मेरी परी नहीं थी। वह खुद में एक परी थी।

क्या यह थोड़ा बेहतर हो सकता है?

परी कहती है, “हाँ। बस इंतज़ार करो और देखो। ”

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मूळ विचार: इंग्रजी

 

माझी परी

काही गोष्टी ह्या आपल्याला आश्चर्यचकित करून टाकतात. माझी हि यात्रा आहे असंच एक आश्चर्य जगण्याची. लोक त्याला योगायोग, देवाची किमया, इच्छापूर्ती अशी अनेक नावं ठेवतात. ते काही असो. मला ते फार आवडतंय.

एके दिवशी माझ्या जुन्या विद्यार्थ्याच्या आईने मला फोन केला सेशन पुन्हा सुरू करण्याबाबत. मी थोडं मागे पुढे केलं पण मला माझ्या विद्यर्थिनिची काळजी होतीच त्यामुळे मी हो म्हणाले. आता मला रोज तिच्या घरी सेशन्स साठी जाणं भाग होतं.

मी तिच्या घरापासून साधारण 2 किलोमीटर अंतरावर राहते. तिच्याकडे जाण्यासाठी सगळ्यात सोपा मार्ग म्हणजे रिक्षा. ते सहजसाध्य आहे. जाता-येताना रिक्षा करणे. मुळीच कठीण नाही. पण नेहमीप्रमाणेच, सैद्धांतिक जगापेक्षा वास्तव वेगळं आहे. सर्व वाहन चालक आपणास पूर्वेकडून पश्चिमेकडे घेऊन जाण्यास तयार होत नाहीत. माझे सेशन संध्याकाळी असते आणि त्या वेळी रहदारी देखील फार असते. मला याचा पूर्वानुभव होता. थोडी भीतीही होतीच.

मी विचार करू लागले कि मी काय करू शकते? मला जाणवलं कि सेशन घेण्यापेक्षा प्रवास मला नकोसा वाटत होता. मग एक विचार उमटला. जर आपण सायकल वापरली तर… तर … तर… ह्या विचाराचं बोट धरून इतर अनेक विचारांनी प्रवेश केला. सगळ्यात पाहिलं तर – माझ्याकडे सायकल नाहीये.  मग मी सायकल विकत घ्यावी का? पण ते फार महाग पडेल. जर सायकल वापरली गेली नाही तर मला उगीच वाईट वाटत राहील आणि पश्चात्तापाची पाळी येईल. मग मी काय करू शकते? मग आतून एक आवाज उमटला त्याचा संबंध मी नवीनच प्रेमात पडलेल्या एक संकल्पनेशी होता – संधारणात्मक विकास. जर मी सायकल उधारीवर वापरू शकले तर? मी खूप विचार करत राहिले. एका दिवशी फेसबुक वर लिहिली माझी इच्छा. म्हटलं फार तर काय होईल कोणीच उत्तर देणार नाही. आणि मीही सायकल उधार घेण्याचे इतर पर्याय शोधेन. किंवा मला रिक्षाच वापरावी लागेल. पण मला समाधान असेल कि मी प्रयत्न केला.

मला फार वाट पाहावी लागली नाही. ४-५ वर्षात न भेटलेल्या एका मैत्रिणीने सायकल उधार द्यायची तयारी दाखवली.

मी थांबलो नाही एक मित्र मी 4-5 वर्षांपर्यंत भेटला नव्हता की मी तिच्या सायकलवर पैसे घेऊ शकेन. काही कॉल आणि संदेशांसह, मला एक सायकल तर मिळालीच परंतु मी माझ्या मैत्रिणीशी पुन्हा जोडली गेले.

मी तिचं नाव परी ठेवलं कारण माझ्या पहिल्या सायकलचं नाव परी होतं.

आता प्रश्न होता कि काय माझं रोज सायकल चालवण्याचं स्वप्न पूर्ण होईल?

आणि इथे मी वास्तवापेक्षा बरंच काही अनुभवलं.

इथे मी आठवड्यातून 4 दिवस 2 किलोमीटर सायकल चालवण्याचे फायदे लिहीत आहे.

1) मी पैसे वाचविले

2) मला शारीरिक क्षमता वाढवण्यासाठी मदत होते. एक पूल चढावा लागतो.

3) हे तब्येतीसाठी चांगले.

4) मला रिक्षा मिळण्यासाठी थांबावे लागत नाही. रहदारीत अडकवे लागत नाही. वेळ वाचतो.

5) मला एका यंत्राशी नातं बांधता येतं. असं म्हणतात कि वापरत राहिल्याने यंत्र चांगली राहतात.

6) नैसर्गिक संसाधनांची बचत होते कारण मी रिक्षा करत नाही आणि पेट्रोल वाचते.

दोन विशिष्ट अनुभव इथे सांगावेसे वाटतात

एक

एके दिवशी सायकलने घरी परतताना मला जाणवले कि कोणीतरी माझ्याकडे पाहत आहे. माझ्या बाजूचा गाडीचालकच होता तो. तो टक लावून पाहत होता. ते फार विचित्र/अशिष्ट होतं. मला घृणा वाटली. मी थांबले आणि त्याला पुढे जाऊ दिले.

रोज अनेक जेवण पोचवणारे सायकलस्वार माझ्याकडे वळून वळून पाहत. अगदी टक लावून. मी कधी विचारले नाही कि ते काय पाहतात. कदाचित मी विचारायला हवे.

मी एक धडा शिकले. अशिष्ट लोक सर्वत्र आहेत आणि आपल्याला त्यांना तोंड द्यावेच लागते !!!

दोन

मुंबईच्या रस्त्यांवरील अनेक खड्ड्यंमुळे मी एक दिवस अडकून सायकलवरून पडले. तेथे इव्हनिंग वॉक घेणाऱ्या एका महिलेने परीला उचलले. मी आपणच उठून उभी राहिले. परीला लागले नव्हते पण मला ३-४ ठिकाणी खरचटले होते. मी पहिले तर परीची चेन निघाली होती. मी ती बसवू लागले. तेवढ्यात एका अनोळखी माणसाने चेन लावून दिली. मी घरी गेले. साधारण एका आठवड्याने मी त्याच रस्त्याने परतत होते. मला तीच महिला दिसली. मी थांबले. तिने मला लगेच ओळखले. तिचे नाव अपर्णा. तिने माझे कौतुक केले आणि सांगितले कि तिला फार बरे वाटले एका स्त्रीला सायकल चालवताना पाहून. तिला अभिमान वाटत होता आणि आपल्या शक्तीची जाणीव होत होती.

मी एक महत्वाची गोष्ट शिकले. परी केवळ माझी परी नव्हती तर ती खरंच स्वतःत एक परी होती, एक देवदूत.

यापेक्षा आणखी काय हवे?

परी म्हणते, “धीर धर. अजून बरंच काही बाकी आहे.

One Reply to “My Angel/मेरी परी/माझी परी”

  1. Heartfelt account, enjoyed reading it thoroughly. You made a smart choice, which shows how our decisions can prove to be worthwhile not just for us, but our environment too.
    Kudos to Angel and you 🙂

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