A full circle/पूर्णत्व

Original thought: English

 

A full circle

Sometimes, while working, I realise that suddenly I have grown up, because it is merely some moment. Just a moment. However, that moment leaves me richer and more satisfied at the end of the day. It is not the years that pass but these small little moments that help me grow up. At least, that is what I believe.

One day, sitting in a parking lot, between my two appointments, I was reading this:

The Tea Ceremony

In Japan, I took part in a tea ceremony. You go into a small room, tea is served, and that’s it really, except that everything is done with so much ritual and ceremony that a banal daily event is transformed into a moment of communion with the universe.

The tea master, Okakura Kakuzo, explains what happens:

‘The ceremony is a way of worshiping the beautiful and the simple. All one’s efforts are concentrated on tying to achieve perfection through the imperfect gestures of daily life. Its beauty consists in the respect with which it is performed. If a mere cup of tea can bring us closer to God, we should watch out for all the other dozens of opportunities that each ordinary day offers us.’

— Paulo Coelho, Like a flowing river

I was upset. I was confused. At the end of the day, I was able to manage staying composed.

After a few years, I was interpreting for a Japanese curator. She was explaining about how there is joy in simplicity. In Japan, this is called ‘Yonobi’. I tried my best and interpreted. For whatever time I was there with them, she kept emphasizing that simplicity is joyous. I kept feeling something that reached my heart and touched my emotions. This was a very busy week, I was really happy, happy that I could do it. My recipe for arranging my work had worked. What was more is that I had enjoyed whatever I had done.

I had assumed that every day would be full of work and I would come home tired and dull. Yes, indeed, every day was full of work, though when I returned, I had more energy and wanted to continue working and contributing in my own way. I am not denying the fact that I was physically tired and needed rest to get back to work.

Though I translated the word ‘Yonobi’ as ‘Simple joys of a plain day’, to translate the concept seems much more difficult. So, it remained with me. This happens with me as a teacher as well. Some of the things that the children share or ask may have some answer on a superficial level, but there may be some aspect of it that stays with me. I do not really endeavor to search for concrete answers. Eventually, they become a part of my conscious reality. Similarly, the word ‘Yonobi’ was added to my conscious reality.

Today, I was dusting my books and was remembering all my favorite lines. It is then that I came across the above paragraph.

Suddenly, the pieces of this particular puzzle seemed to have fallen in place. A circle got completed.

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मूळ विचार: इंग्रजी

 

पूर्णत्व

कधी कधी काम करताना क्षणभर काहीतरी होतं आणि मला जाणवतं की मी मोठी झाले आहे. एक क्षण! पण हाच एक क्षण दिवसाच्या शेवटी मला मोठं करून जातो, समाधानी करून जातो. जाणाऱ्या वर्षा बरोबर नव्हे तर अनुभवलेल्या या छोट्या छोट्या क्षणाबरोबर मी मोठी होत जाते. किमान मला तरी असं वाटतं. एके दिवशी माझ्या दोन कामांच्या मध्ये एका पार्किंग लॉट मध्ये बसून मी हे वाचत होते.

टी सेरेमनी (चहाचा समारंभ)

जपानमध्ये मी चहाच्या समारंभामध्ये भाग घेतला. तुम्ही एका छोट्या खोलीत जाता, तिथे चहा दिला जातो आणि एवढंच. खरंच. पण वेगळी गोष्ट ही की सगळं अगदी व्यवस्थित पद्धतशीररीत्या आणि समारंभाच्या पद्धतीने केलं जातं आणि त्यामुळेच एक क्षुल्लक दैनंदिन काम जणूकाही संपूर्ण ब्रह्मांडा सोबतच्या मेजवानी मध्ये बदलून जातं. टी मास्टर, म्हणजेच चहा समारंभाचे प्रमुख, ओकाकुरा काकूझो चहा समारंभा विषयी स्पष्टीकरण  करतात. चहा समारंभ म्हणजे सौंदर्य आणि साधेपणा यांची एक प्रकारे पूजा करत दैनंदिन जीवनातील अपरिपूर्ण कामांना परिपूर्ण ते पर्यंत नेण्यासाठी जीवाची पराकाष्ठा करणे. त्याचं सौंदर्य हा समारंभ ज्या आदराने निभावून नेला जातो त्या आदरा मध्ये आहे. जर एक साधा कपभर चहा आपल्याला देवा पर्यंत नेऊ शकतो, तर मग आपण आपल्याला रोज मिळणाऱ्या अनेक संधींकडे लक्ष ठेवले पाहिजे.

— पाऊलो कोहलो, लाईक  अ फ्लोइंग रिवर

हे वाचण्याआधी मी थोडीशी उदास होते, गोंधळले होते. पण दिवसाच्या शेवटी मी स्वतःला सांभाळण्यात यशस्वी झाले.

काही वर्षांनंतर मी एका जपानी क्युरेटर साठी भाषांतर करत होते. त्या सांगत होत्या कि आनंद हा कसा साध्या गोष्टींमध्ये लपलेला असतो. जपानमध्ये याला योनोबी म्हणतात. मी माझ्या परीने हे भाषांतरित करण्याचा प्रयत्न केला. जेवढा काही वेळ मी त्यांच्याबरोबर होते, त्या साधेपणातल्या आनंदा विषयी बोलत तो अधोरेखित करत राहिल्या. मला एक वेगळीच अनुभूती आली. काहीतरी माझ्या हृदया पर्यंत पोचून माझ्या भावनांना हात घालत होतं. तो आठवडा फार व्यस्त गेला. मी खूप आनंदी होते. आनंदी यासाठी की मी सगळं निभावून नेऊ शकले. माझ्या वेगवेगळ्या जबाबदाऱ्या सांभाळण्याची माझी पद्धत अगदी बिनचूक ठरली होती आणि त्याहीपेक्षा महत्त्वाचं म्हणजे मी जे काही करत होते ते फार मजा घेउन करत होते.

मला वाटलं होतं की दिवसभर भारंभार काम करून मी थकून, कंटाळून घरी येईन आणि निश्चितच दिवस भर काम असायचं. पण जेव्हा मी घरी यायचे तेव्हा माझा उत्साह आणखीनच वाढलेला असायचा. मला, असंच, माझ्या परीने आपला खारीचा वाटा उचलत काम करत राहायचं होतं. मी असं म्हणत नाहीये की माझ्या शरीराला आरामाची गरज नव्हती. दुसऱ्या दिवशी पुन्हा काम करायला तशी गरज होतीच.

जरी मी योनोबी या जपानी शब्दाचा ‘साध्या दिवसांचा साधा आनंद’ असं भाषांतर केलं, तरी ह्या संकल्पनेचं भाषांतर करणं फार फार कठीण होतं. म्हणूनच ही संकल्पना माझ्यापाशी राहून गेली. शिकवतानाही असं होतं माझ्यासोबत. काही गोष्टी ज्या मुलं सांगतात, विचारतात त्याच्याकडे सरळ साध्या पद्धतीने आणि काही गहिरा पद्धतीनेही पाहिलं जाऊ शकतं.  त्यामुळे तिथल्या तिथे जरी साधी उत्तर देऊन मुलांच्या मनातले प्रश्न संपले तरी माझ्या मनात मात्र ते प्रश्न राहून जातात. मी काही त्या प्रश्नांची साधी सरळ उत्तर शोधण्यात गुंगून जात नाही. हे प्रश्न माझ्या मीपणाचा एक भाग बनून जातात आणि अगदी तसंच हा शब्द योनोबी ही माझ्या मीपणाचा, अस्तित्वाचा एक भाग बनून गेला.

आज मी माझ्या पुस्तकांवरची धूळ झटकत, त्यात वाचलेले माझे आवडते उतारे आठवत होते आणि अचानक वरती टी सेरेमनी विषयी लिहिलेल्या उताऱ्यापाशी येऊन पोहोचले.

अचानकच एखाद्या चित्राचे सगळे तुकडे एकत्र यावेत त्याप्रमाणे झाले. माझ्या मनातल्या एका प्रश्‍नाला पूर्णत्व बहाल झालं.

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मूल विचार: अंग्रेजी

 

पूर्णत्व

कभी-कभी काम करते हुए एक पल में ऐसा कुछ हो जाता है कि मुझे लगने लगता है कि मैं अचानक बड़ी हो गई हूं। एक ही पल किंतु यह एक ही पल मुझे बड़ा कर जाता है। सुकून दे जाता है। कम से कम मुझे तो ऐसे ही लगता है। एक दिन की बात है। जब दो कामों के बीच में एक पार्किंग लॉट में बैठकर यह पढ़ रही थी।

टी सेरेमनी (चाय का समारोह)

जापान में मैं चाय के समारोह में सहभागी हुआ था। आपको एक छोटे से कमरे में लेकर जाते हैं, वहां चाय परोसी जाती है और बस इतना ही। इसमें अलग बात सिर्फ यह है कि सब बहुत ही सलीके से, रिवाजों से, समारोह के उत्साह में किया जाता है। और उसी की बदौलत, एक आम रोजमर्रा का काम जैसे पूरे विश्व के साथ अद्वैत के एक पल में परिवर्तित हो जाता है। टी मास्टर, यानी कि चाय के समारोह के प्रमुख, ओकाकुरा काकूझो, चाय के समारोह के विषय में बोलते वक्त कहते हैं, चाय समारोह सौंदर्य और सादगी इनकी रोज की जिंदगी में होने वाली अहमियत को पूजा के भाव से देख कर रोजमर्रा के जीवन में जो परिपक्वता से भरे हुए काम होते हैं उन्हें उनके अंजाम तक परिपक्वता तक ले जाने के लिए किए जाने वाले परिश्रमोका एक स्वरूप है। इस समारोह का सौंदर्य जिस आदर भाव से इसे निभाया जाता है उस भाव में है। एक मामूली सी प्यालीभर चाय अगर हमें भगवान तक पहुंचा सकती है, तो फिर हमें हर रोज मिलने वाले ऐसे अनेकों मोको की तरफ ध्यान रखना चाहिए।

— पाउलो कोहेलो, लाइक ए फ्लोइंग रिवर।

यह पढ़ने से पहले में थोड़ी उदास थी, कुछ समझ नहीं आ रहा था। पर इसके बाद, दिन के अंत में मैं खुद को संभालने के काबिल बन सकी।

कुछ वर्षों बाद ,मैं एक जापानी क्यूरेटर के लिए अनुवादक का काम कर रही थी। वे बता रही थी की सुख कैसे मामूली चीजों में छुपा हुआ होता है। जापान में इसको योनोबी कहते हैं। मैंने अपनी तरफ से तो इसका अनुवाद करने का पूरा प्रयास किया। जितना भी वक्त में उनके साथ थी वह इस मामूली से चीजों से मिलने वाले सुख के विषय में बोलती रही। मुझे कुछ अलग ही अनुभूति हुई। कुछ मेरे ह्रदय तक पहुंच कर मेरी भावनाओं को छू गया था। वह हफ्ता बहुत व्यस्त था। मैं बहुत ही सुख का अनुभव कर रही थी। सुख इसका कि मैं सब निभा पा रही थी। मेरी सारी जिम्मेदारियां निभाने का मेरा तरीका अचूक सिद्ध हुआ था। और उससे भी महत्वपूर्ण यह था कि मैं जो कुछ भी कर रही थी उसे मैं बहुत ही आनंद लेकर कर रही थी।

मुझे लगा था की रोज दिन भर इतना सारा काम कर मैं घर आऊंगी तब थक जाऊंगी, बोरियत होगी मुझे। कुछ हद तक यह सही भी था। निश्चित ही दिन भर काम रहता था। लेकिन जब मैं घर लौटती, तब मैं उत्साह से और भी भरी हुई होती। मुझे लगता जितना मेरे से बन पड़ रहा है, वह मैं कर पा रही हूं। ऐसा नहीं था कि मेरे शरीर को आराम की जरूरत नहीं थी। अगले दिन फिर काम पर लगने के लिए वैसे जरूरत जरूर थी।

मैंने योनोबी इस जापानी शब्द का ‘साधारण से दिनों का साधारण सा आनंद’ ऐसा अनुवाद किया था। फिर भी इस संकल्पना का अनुवाद करना बहुत ही मुश्किल था। शायद उसी की वजह से यह संकल्पना मेरे मन में रह गई। ऐसे हो ही जाता है मेरे साथ। जब मेरे छात्र मुझसे कुछ सवाल करते हैं, कुछ बताते हैं, तब उन चीजों की तरफ अलग अलग नजरिए से देखा जा सकता है। उन सवालों का सीधा साधा जवाब तो मैं छात्रों को दे देती हूं। लेकिन उनकी गहराइयां मेरे मन में रह जाती हैं। मैं उन सवालों का जवाब तो ढूंढती नहीं फिरती, लेकिन वह सवाल मेरे अस्तित्व का एक हिस्सा बन जाते हैं। वैसे ही यह शब्द योनोबी मेरे अस्तित्व का, स्वत्व का एक हिस्सा बन गया।

आज मैं मेरे किताबों को साफ कर रही थी। उन पर जमी हुई धूल साफ करते हुए मेरे पसंदीदा जुमले मुझे याद आ रहे थे। और उपर लिखा हुआ टी सेरेमनी का वर्णन उसी में से एक था।

अचानक ही मानो एक पहेली के सब सिरे एक साथ सामने आ गए ,और मेरे मनके एक प्रश्न को अपना पूर्णत्व मिल गया।

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