Routine!/दिनक्रम!/रोज जैसा!

Original thought: English

 

Routine!

We walk every day. It is probably the first thing we learn in our life. Take a step. Maintain your balance on one leg. Take another step. Maintain your balance on the other leg. We keep on doing this. Do we need to think about walking? NO! Obviously NO!

One day, while taking a stroll, I felt that I should think about how I want to walk. I could hop and skip while walking and turn around myself. I could change the strides that I take. Why not?

Tell me honestly, what are the 10 things that you have never done before?

Initially, when someone would ask me such a question, I would say not visited any country other than India, never eaten meat, never attempted to learn Mandarin, and so on. However, as things changed, I changed. I started looking at things in a different way and I found so many things that I haven’t done as an adult. For example, hopping and skipping on the road while walking, running with my hands open on empty roads, thanking the signals for helping me deal with traffic, wearing the clothes the way like them to be, mixing cuisines and trying out the combinations, laughing at my own silly jokes and the list goes on.

So, my change of perspective simply meant doing what I believed in whether it is walking or smiling, working or enjoyment.

I believe we all have read this sentence somewhere or the other: Every person is unique.

If this holds true, then how do we walk, talk and run alike. I am not asking anyone to change the way they are doing all the activities. I am simply asking to pay attention while doing these things, to think about them, and to decide whether that’s your way of doing those things.

Find your way!

That’s all! :))

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मूळ विचार: इंग्रजी

 

दिनक्रम!

मी दररोज चालते. कदाचित आपल्या आयुष्यात आपण शिकलेली ही पहिलीच गोष्ट. एक पाऊल टाका. एका पायावर आपले संतुलन राखून ठेवा. दुसरे पाऊल टाका. दुसऱ्या पायावर आपला भार टाका. चालताना विचार करावा लागतो का? नाही! अर्थातच नाही!

एक दिवस, स्वतःच्याच तंद्रीत हरवलेलं असताना, मला वाटलं चालायचं कसं याचाही विचार करायला हवा. मी उड्या मारत, लंगडी घालत किंवा अगदी गिरक्या घेतही चालू शकते. मी लहान-मोठी पावलं टाकू शकते. का नाही?

प्रामाणिकपणे सांगायचं हं! आतापर्यंतच्या आयुष्यात अशा कोणत्या १० गोष्टी तुम्ही कधीच केल्या नाहीत?

सुरुवातीला जेव्हा कोणी मला असा प्रश्न विचारायचं तेव्हा मी सांगायचे की भारताव्यतिरिक्त कोणत्याही देशाला भेट दिली नाही, कधी मांसाहार केला नाही, चीनी भाषा शिकण्याचा कधीही प्रयत्न केला नाही, इत्यादी. तथापि, जशा गोष्टी बदलत गेल्या तशी मीही बदलत गेले. मी काही गोष्टींकडे जसं वेगळ्या प्रकारे बघू लागले तसं मला अशा काही गोष्टी सापडल्या की ज्या मी मोठं झाल्यावर केल्या नव्हत्या.  उदाहरणार्थ, रस्त्यावर उड्या मारत लंगडी घालत चालणं, हात पसरून रस्त्यावर विमानासारखं धावणं, रस्ता ओलांडायला मदत केल्याबद्दल सिंग्नलचे आभार मानणं, मला हवे तसे कपडे घालणं, विविध खाण्याचे पदार्थ त्यांचा एकमेकांशी काही संबंध नसतानाही एकत्र करणं आणि त्या मनसोक्त खाणं, स्वतःच्याच निरर्थक विनोदांवर हसणं आणि आणखी खूप काही.

माझा दृष्टिकोन बदलला म्हणजे फार काही मोठं नाही झालं. मी एवढंच ठरवलं कि चालणं असो वा हसणं काम असो वा मजा ती आपल्याला पटेल तशीच करायची.

मला खात्री आहे आपण सगळ्यांनीच कुठे ना कुठेतरी वाचले असेल कि प्रत्येक व्यक्ती अद्वितीय असते.

हे जर खरं असेल तर आपण सगळे चालतो, बोलतो, धावतो ते एकसारखं कसं काय? मी असं नाही म्हणत कि सगळ्यांनी एखादी गोष्ट करण्याची पद्धत बदलावी. माझं फक्त इतकंच म्हणणं आहे कि या गोष्टी करतांना लक्ष द्या, त्यांचा विचार करा आणि बघा तुम्ही जशा या गोष्टी करताहात ती ‘तुमची’ पद्धत आहे का!

आपला मार्ग शोधा!

एवढंच! :))

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मूल विचार: अंग्रेजी

 

रोज जैसा!

हम हर दिन चलते हैं। यह संभवतः पहली बात है जो हम अपने जीवन में सीखते हैं। एक कदम बढ़ाओ। एक पैर पर अपना संतुलन बनाए रखो। एक और कदम उठाओ। दूसरे पैर पर अपना संतुलन बनाओ। हम यह करते रहेंगे। क्या हमें चलने के बारे में सोचना पडता हैं? नहीं! जाहिर सी बात है, नहीं!

एक दिन, टहलने हुए, मुझे लगा कि मुझे इस बारे में सोचना चाहिए कि मैं कैसे चलना चाहती हूँ। चलने और घूमने के दौरान मैं उछल सकती हूँ, कूद सकती हूँ, लंगड़ाकर चल सकती हूँ। मैं छोटे-बड़े कदम ले सकती हूँ। क्यों नहीं?

मुझे सच बताओ, ऐसी क्या १० चीजें हैं जो आपने पहले कभी नहीं की हैं?

पहले, जब कोई मुझसे ऐसा प्रश्न पूछता, तो मैं कहती कि भारत के अलावा किसी अन्य देश का दौरा नहीं किया, कभी मांस नहीं खाया, कभी भी चीनी भाषा सीखने का प्रयास नहीं किया। हालांकि, जैसे चीजें बदलीं, मैंभी  बदल गई। मैंने चीजों को एक अलग तरीके से देखना शुरू किया और मुझे इतनी सारी चीज़ें मिलीं जो बड़े होनेपर मैंने कभी नहीं की थी। जैसे की, चलते समय सड़क पर उछलना और कूदना, खाली सड़कों पर हाथ फैलाकर दौड़ना, रास्ता पार करने के लिए मदद करने के लिए सिग्नल का धन्यवाद करना, अपने तरह से कपड़े पहनना, जिनका कोई संबंध नहीं ऐसे व्यंजनों को मिलाकर उन संयोजनों को आजमाना, अपने आप के बेतुके से चुटकुलों पे हँसाना और ऐसा बहुत कुछ।

मुझमे सिर्फ इतना बदलाव आया था की मैंने ठान लिया था की मैं जो भी करूँ चलना या मुस्कुराना काम करना या आनंद लेना अपनी तरह से करूँ।

मेरा मानना है कि हम सभी कही न कहीं पढ़ा है की हर व्यक्ति अद्वितीय है।

यदि यह सच है, तो हम कैसे एक जैसे चलते हैं, बात करते हैं और दौड़ते हैं। मैं किसी से भी कुछ भी बदलने के लिए नहीं कह रही। मैं बस कह रही हूँ की ये चीजें करते हुए थोड़ा ध्यान दे , उनके बारे में सोचें और फिर तय करें की ये आपका तरीका है या नहीं।

अपना रास्ता ढूंढों!

बस इतना ही! :))

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