The girl on the swing/झुले पार बैठी हुई लड़की/झोपाळ्यावर बसलेली मुलगी

Original thought: English

The girl on the swing

Mumbai is a metropolitan city. It denotes all the comforts and discomforts a metropolitan city can offer. Living in Mumbai makes me more like Mumbai. It has the potential to make me run for the hills screaming. However, it also has the potential to make me exclaim, “Aww!!!” I have met the kindest people in this unkind city and have witnessed the spirit of humanity up close when the metropolitan seems self-centred and lost otherwise.

There is a festival called “Kalaghoda Festival” which started in 1998. It is organised in every February. I like to visit this festival to understand different things and explore.

The festival offers everything from literature to singing and drama to sculpture.

It becomes difficult to walk in that area on weekends as it is quite crowded.

This year, I simply took a walk because that’s what I had decided. The theme was saving trees. It depicted through various ways how it was important to save trees now. The artists had tried to depict it quite innovatively. I was touched by that.

While walking ahead, I saw a stall with a few books kept there. I happened to see those books. Now, the funniest thing about these books was that they were books without words. Isn’t that interesting. Other than the title, there was not a single word written in those books. The author asked me to read them. I started reading the books without words and was captivated by them. I went on and on and finished reading all the five books he showed me. I tried to communicate my joy to him and he seemed happy too. I think I quite connected with him. I thanked the festival and moved on.

The next stop I took was near an old library. It was the venue for all the literary events. I entered and started reading all the notices that were stuck on the glass at the reception. One of the notices said that the library was going to complete 150 years. I was inspired by the fact that the library had such a huge history.

Moving ahead, I reached the garden area. I roamed here and there and came near a swing. There was a girl sitting there. I asked her if I could also sit on the swing. She said that she was leaving and I could use the swing. I asked her if she knew what discussion would be there. I couldn’t believe what she said. She said that she was one of the panelist who were going to talk about the poetry initiatives in Mumbai. I was thrilled. I sat for the talk and listened to everyone. It was quite an honest journey that each had taken to build their own community of poets. All of them talked about how they worked without losing hope and continued. Along with a lot of other things, I filled my heart with hope.

I thanked “the girl on the swing” and left.

Every time, I step out of my house to explore Mumbai, I an reacquainted with a new face of her. Always.

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मूल विचार अंग्रेजी
झूले पर बैठी हुई लड़की
मुंबई एक महानगर है। यह जगह एक महानगर में रहने के फायदे और नुकसानों को बहुत अच्छे से दिखाती है। मुंबई में रहने से मैं और ही मुंबई की तरह बन जाती हूं। मुंबई में वह ताकत है जो मुझे पहाड़ों की तरफ चिल्लाते हुए दौड़ा सके। लेकिन उसमें यह भी ताकत है कि जो मुझे आज कहने को मजबूर करे, “कितना अच्छा हुआ!” मैं इस बेहद बेरुखे से शहर में सबसे ज्यादा दयालु लोगों से मिली हूं। यह महानगर जो खुदपसंद और गुमशुदा लगता है उसमेंही इंसानियत का जज्बा कूट कूट कर भरा हुआ देखा है मैंनें।
इस महानगर में 1998 से एक उत्सव का आयोजन किया जाता है, “काला घोड़ा महोत्सव।” इस उत्सव का आयोजन हर फरवरी में किया जाता है। मुझे अलग-अलग चीजें समझने के लिए और नई चीजों का अनुभव करने के लिए इस उत्सव में शामिल होना पसंद हैं।
इस उत्सव में वाङ्मय, गाना, नाटक, शिल्पकारी सब है।
शनीचर और इतवार को तो यहां पर चलना मुश्किल ही हो जाता है क्योंकि लोगों की भीड़ लगी रहती हैं।
इस साल मैंने सोचा था कि मैं सिर्फ एक बार घूम के आऊंगी और मैंने वही किया। इस साल का उद्देश्य था वृक्ष बचाना। हर एक कलाकृति अपनी तरह से यह बता रही थी कि वृक्षों को बचाना कितना महत्वपूर्ण है। हर एक कलाकार ने अपने ही अंदाज से अलग तरीके से यह ही बताना चाहा। मुझे देख कर बहुत समाधान की अनुभूति हुई।
आगे जाते हुए मैंने एक छोटी सी दुकान देखी जहां पुस्तकें रखी हुई थी। मैंने पुस्तकों को देखा। इन पुस्तकों के बारे में सबसे मजेदार बात यह थी कि यह बिना शब्दों की किताबे थी। वे मुझे बहुत अलग लगी। शीर्षक के अलावा पुस्तकों में एक भी शब्द नहीं था। पुस्तकों के लेखक ने मुझे उन्हें पढ़ने के लिए कहा। जैसे-जैसे मैं पढ़ती गई उन किताबों की संकल्पना ने मुझे जैसे जकड़ के रखा। मैं पढ़ती गई और लेखक ने दिखाए पांचो पुस्तकों को मैंने पढ़ भी लिया। मैंने अपने आनंद को उन तक पहुंचाना चाहा और शायद वह भी खुश थे। ऐसा लगा कि हमें किसी अनुभूति की डोर ने बांध दिया था। मैंने मन ही मन इस उत्सव के आभार व्यक्त किए और मैं चल पड़ी।
मेरा अगला पड़ाव था एक पुराना सा ग्रंथालय। यह ग्रंथालय वांङमय के समारोह का स्थल था। जैसे ही मैं अंदर गई, मैंने उधर चिपकाए हुए अलग अलग कागजों को पढ़ना शुरू कर दिया। उसमें से एक परिपत्रक बता रहा था कि यह ग्रंथालय है अपने 150 साल पूरे करने वाला था। मुझे यह सोच कर बहुत खुशी हुई की इस ग्रंथालय का इतिहास इतना पुराना था।
आगे बढ़ते हुए मैं बगीचे तक पहुंच गई। मैं इधर-उधर घूमते-घूमते झूले तक आ पहुंची। एक लड़की वहां बैठी थी। मैंने उससे पूछा, “क्या मैं झूले पर बैठ सकती हूं।” उसने बोला कि वह चली जा रही है तो मैं बैठ सकती हूं। मैंने उससे पूछा कि वहां क्या चर्चा होने वाली है और उसका उत्तर सुनकर मेरा मेरे कानों पर विश्वास ही नहीं रहा। वह मुझे बताने लगी कि वह भी इस चर्चा में भाग लेने वाले अतिथियों में से एक है जिन्होंने मुंबई में कविताओं के प्रचार के लिए प्रयास किया था। मुझे बहुत खुशी हुई। मैं उस चर्चा को सुनते हुए वहां बैठ गई। हर एक अतिथि की यात्रा बहुत प्रेरणादायक थी। हर एक ने अपना ही एक छोटा सा कवियों का गठन बनाया था। उनके प्रयासों ने मेरे दिल को आशा से भर दिया।
मैंने झूले पर बैठी हुई लड़की को धन्यवाद कहा और चल पड़ी।
हर बार मैं जब अपने घर से बाहर कदम रखती हूं, तो मुंबई अपना ही कोई नया चेहरा मुझे दिखा देती हैं। हमेशा!
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मूळ विचार: इंग्रजी

झोपाळ्यावर बसलेली मुलगी
मुंबई हे एक महानगर आहे आणि महानगराचे फायदे आणि तोटे हे दाखवणारी ही अगदी मोक्याची जागा आहे. मुंबईमध्ये राहून मी आणखी आणखी मुंबई सारखी होत चालले आहे.मुंबईमध्ये अशी ताकद आहे की जी मला डोंगराच्या दिशेने ओरडत पळायला भाग पाडेल. पण तिच्याकडे अशीही ताकत आहे जी मला म्हणायला भाग पाडेल की “बरं झालं.” मी या अत्यंत रुक्ष शहरात सगळ्यात जास्त दयाळू लोकांना भेटले आहे आणि हे महानगर जे एरवी स्वतःमध्ये मग्न आणि हरवलेलं वाटतं त्यामध्येच मी माणुसकीचा असा काही रंग पाहिला की मन भरून जाईल.
या महानगरांमध्ये 1998 पासून एका उत्सवाचे आयोजन केले जाते. त्या उत्सवाचं नाव आहे “काळा घोडा महोत्सव.” हा महोत्सव दर फेब्रुवारीत साजरा केला जातो. नवनवीन गोष्टी जाणून घेण्यासाठी आणि वेगळं काहीतरी पाहण्यासाठी मला इथे जायला आवडतं.
या उत्सवात वाङमय, गाणं, नाटक, शिल्पकृती सगळं काही आहे. शनिवार-रविवारी तर इथे चालणं सुद्धा कठीण होऊन जातात इतकी गर्दी असते.
या वर्षी ठरवल्याप्रमाणे मी नुसता फेरफटका मारत होते.यावर्षीचा विषय होता झाडं वाचवणे. प्रत्येक कलाकृती आपल्या परीने हे सांगण्याचा प्रयत्न करत होती की झाडं जगवणं किती महत्त्वाचा आहे. प्रत्येक कलाकाराने आपल्या शैलीत हे सांगितलं होतं हे पाहून मला फार समाधान वाटलं.पुढे गेल्यावर मला एक पुस्तकांचं छोटसं दुकान दिसलं. मी ती पुस्तके पाहिली. गमतीची गोष्ट म्हणजे हे पुस्तक बिना शब्दांची होती. मला ती खूप वेगळी वाटली. शीर्षका व्यतिरिक्त पुस्तकात एकही शब्द नव्हता. लेखकाने मला ती पुस्तकं वाचायला दिली. मी जसजशी ती पुस्तकं वाचत गेले, तसतशी त्यात पूर्ण गढून गेले. लेखकाने मला पाच पुस्तकं दिली आणि मी ती वाचली देखील. मला झालेला आनंद मी व्यक्त करण्याचा प्रयत्न केला. समोरचा लेखकही आनंदलेला दिसला. जणू अनुभूतीच्या दोराने आम्ही बांधले गेलो होतो. मी मनोमन या महोत्सवाचे आभार मानले आणि पुढे चालू लागले.
नंतर मी गेले एका खूप जुन्या वाचनालयात. हेच वाचनालय वाङमयाच्या समारंभाचं स्थान होतं. तिथे पाठी चिकटवलेले अनेक कागद मी वाचू लागले. एका परिपत्रकावर असं लिहिलं होतं की वाचनालयाला एकशे पन्नास वर्ष पूर्ण होणार होती. मला फार आनंद झाला की या वाचनालयाचा इतिहास इतका जुना होता.
पुढे गेल्यावर मी बागेत पोचले. इकडे-तिकडे फिरता फिरता झोपाळ्याशी येऊन थबकले. एक मुलगी तिकडे बसली होती. मी तिला विचारलं की मला झोपाळ्यावर बसता येईल का. तिने सांगितलं की ती उठणार आहे त्यामुळे मला बसता येईल. मी सहजच तिला विचारलं की इथे काय चर्चा होणार आहे. तिने उत्तर दिलं त्याने मी आश्चर्यचकित झाले. तिने मला सांगितलं कि ती या चर्चेत भाग घेणार्‍या पाहुण्यांपैकी एक आहे. हे सगळे पाहुणे मुंबईमध्ये कवितेचा प्रचार आणि प्रसार करण्यासाठी प्रयत्न करणाऱ्यांपैकी आहेत. मी फार आनंदाने होणारी चर्चा ऐकत बसले. प्रत्येक पाहुण्याची यात्रा प्रेरणादायक होती. प्रत्येकाने आपला छोटा कवींचा चमू बनवला होता. त्यांच्या प्रयत्नांनी माझं मन आशेने भरून टाकलं. मी झोपाळ्यावर बसलेल्या मुलीचे आभार मानले आणि पुढे चालू लागले.
प्रत्येक वेळी जेव्हा मी घराबाहेर पाऊल टाकते तेव्हा मुंबई मला आपला एक नवीनच चेहरा दाखवून जाते. अगदी नेहमी!

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