Confessions of a grateful volunteer/एक एहसानमंद स्वयंसेवक के बयान/कृतज्ञ स्वयंसेवकाचा कबुलीजबाब

Original thought: English


I have volunteered for several organizations since my student life. You generally volunteer for different reasons. I am listing a few here.

  • It’s a good cause.
  • You want to have new experiences.
  • You are needed by the organization to volunteer.
  • You have a lot of time and it is a constructive way of spending it.

I want to confess several things from my life as a volunteer.

Bathing is a luxury

When I volunteered, be for art festivals or saving butterflies, all the team worked together for the events from morning to night. Sometimes, even in the night. When I worked as a volunteer for Wall Art Festivals, I got up with everyone, worked with everybody and shared living space with them. This helps in finishing the work fast. When I would volunteer around Mumbai and come back home, all I needed was a bath to just feel comfortable and sleep. When you share the living space though you also share the bathroom. So, there is a queue for bathing. So, if you spend a lot of time inside the bathroom, you might hear a slight knock on your door reminding you that the next person is waiting.

I confess to have taken my mobile phone into washroom to ensure that I can listen to the music. This helped me feel comfortable and also to keep a track of time.

Discovering yourself

When you are just having different experiences through volunteering, you realise you are more than what you think you are.

I come alive when I am around children. Being with children and helping them learn gives me more satisfaction than anything in the world. Well, it took me a lot of time to realise this. The two major projects I worked with as a volunteer Wall Art Festival and Bring Back Butterflies needed me to interact with children and more importantly connect with them effectively. I still cannot believe I can do it.

I confess that I was doubted myself at least 100 times. I confess that for me children are it and it’s all thanks to these projects.

It also took me a lot of time to realise that I can talk to people and connect with them. What is more? I actually don’t have stage fright. Well, I still am nervous while interacting with people and afraid when talking on stage. I manage it fine though not exceptionally well. In both the projects mentioned above, I interacted with different kinds of teachers, students, parents and even principals. The projects turned out to be good. So, I must have done my part fine.

I confess that my feet trembled as I climbed the stairs of the stage. I confess that I feel more confident talking to people now.

I do not like shopping. When I started volunteering for Wall Art Festivals, I never imagined myself shopping in bazars. When I first went to the market in Khagaria, Bihar, India, I explored little bit. Then, eventually, I knew where I could get electrical testers, brooms, dustpans, spices, fruits, shoes, dairy products, alcohol and anything and everything. I discovered a chai-vender who served amazing Samosa (Indian snack). I do not understand roads easily. However, now the main roads around the market are stored in my memory forever.

I confess that shopping isn’t that boring.

I along with another volunteer made brochures for the festival. When our draft was ready, we started making them. They were handmade. I made a mistake. I could not erase it because I directly started writing with a pen. I was scolded by my partner and I promised her not to make the same mistake again.

I confess that though I am a teacher now, I was scolded badly for this one. I deserved it.

There are many more things that I have learnt without being aware. I cannot be grateful enough for all the volunteering experiences I have had. I hope to have many many more in the future.


मूल विचार: अंग्रेजी


मेरे छात्र जीवन के दरम्यान और बाद में भी मैंने कई संगठनों के लिए स्वयं सेवा की है। हम आम तौर पर विभिन्न कारणों से स्वयंसेवक बनते हैं। मैं कुछ करणों की यहाँ सूची बना रही हूँ।

  • काम बहुत अच्छा है।
  • आप नए अनुभव लेना चाहते हैं।
  • संस्था के लिए आप स्वयंसेवक बनना आवश्यक हैं
  • आपके पास बहुत समय है और स्वयंसेवा उसे बिताने का एक रचनात्मक तरीका है।

आज मैं स्वयंसेवक के रूप में अनुभव की हुई कई चीजों को स्वीकार करना चाहती हूँ।

स्नान एक लक्जरी है।

कला त्योहारों के लिए या तितलियों को बचाने के लिए, मैं सभी टीम के साथ मिलकर सुबह से रात तक काम करती थी। कभी-कभी, रात में भी। जब मैंने वॉल आर्ट फेस्टिवल के लिए एक स्वयंसेवक के रूप में काम किया, तो मैं हर किसी के साथ घुल मिल गयी थी, सभी के साथ काम करती थी और उनके साथ ही रहती थी। ऐसा इंतजाम तेजी से काम खत्म करने में मदद करता है। जब मैं मुंबई के आसपास स्वयंसेवक बनकर काम करती हूँ और घर वापस आती हूं, तो मुझे सिर्फ गरम  पानी से नहाकर आराम से सोने का मन करता हैं। । जब आप एक साथ रहते हैं, तब आप सब मिलकर एक ही बाथरूम का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए, स्नान करने के लिए एक कतार लगती हैं। यदि आप बाथरूम के अंदर बहुत समय बिताते हैं, तो थोड़ी देर बाद आप अपने दरवाज़े पर एक हल्कीसी दस्तक सुन सकते हैं। जिससे आपको चेतावनी मिलती है कि अगली व्यक्ति इंतजार कर रही है।

मैं कबूल करती हूँ की मैं गाने सुनने के लिए मोबाइल फोन वॉशरूम में ले जाती थी। इससे मैं आराम से नहाती भी थी और समय पर ध्यान भी रख सकती थी।

अपने आप को खोजना

जब आप स्वयंसेवा के माध्यम से अलग-अलग अनुभव लेते हैं, तो आप यह महसूस करते हैं कि आप जितना सोचते हैं उससे आपकी क्षमता अधिक हैं। मैं जब बच्चों के साथ होती हूँ तब लगता हैं कि सही मायने में जिंदा हूँ। बच्चों के साथ रहना उन्हें सीखने में मदद करना मुझे दुनिया की किसी चीज़ की तुलना में अधिक संतुष्टि देती है I खैर, मुझे यह समझने के लिए बहुत समय लगा। दो प्रमुख परियोजनाएं जिन के लिए मैंने एक स्वयंसेवक बनकर काम किया वो हैं वॉल आर्ट फेस्टिवल और ब्रिंग बैक बटरफ्लाईज़। इनमें बच्चों के साथ बातचीत करना आवश्यक था और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण था की उनके साथ प्रभावी रूप से जुड़ें। मुझे अभी भी विश्वास नहीं होता की मैं यह कर सकता हूँ। मैं कबूल करती हूँ कि मुझे कम से कम 100 बार संदेह हुआ होगा।

मैं कबूल करती हूँ की मेरे लिए ये बच्चे ही सब कुछ हैं। इन परियोजनाओं की वजह से ही  तो मुझे ये एहसास हुआ। मैं उसके लिए एहसानमंद हूँ।

मुझे यह महसूस करने में बहुत समय लगा कि मैं लोगों से बात कर सकती हूँ और उनके साथ जुड़ सकती हूँ। मुझे वास्तव में मंच से डर नहीं है। खैर, मुझे अब भी लोगों के साथ बातचीत करते समय बेचैनी होती हैं और मंच पर बात करते समय डर लगता हैं। हालांकि मैं बहुत अच्छेसे नहीं लेकिन ठीक-ठाक बातचीत कर लेती हूँ। उपरोक्त दोनों परियोजनाओं में, मैंने विभिन्न प्रकार के शिक्षकों, छात्रों, माता-पिता और यहां तक ​​कि प्रधान अध्यपकों से भी बातचीत की। परियोजनाएं सफल हो गईं इसलिए, मुझे लगता हैं मेरा काम भी ठीकसे हुआ होगा ऐसा लगता हैं।

मैं कबूल करती हूँ कि आज भी मंच की सीढियाँ चढ़ते वक़्त मेरे पैर कांपते हैं। मैं कबूल करती हूँ कि मैं अब लोगों से अधिक आत्मविश्वास से बातचीत कर सकती हूँ।

मुझे ख़रीदारी पसंद नहीं। जब मैंने वॉल आर्ट फेस्टिवल के लिए स्वयंसेवक के तौर पर काम करना शुरू कर दिया, मैंने कभी सोचा नहीं था कि मैं बाजारों मैं खरीदारी करुँगी। जब मैं पहली बार खगरिया, बिहार, भारत में बाजार गई, तो मैं थोड़ी सी ही इधर उधर होकर आ गई। फेस्टिवल के आखरी दिन तक मुझे इलेक्ट्रिकल टेस्टर्स, झाडू, धूंट, मसाले, फलों, जूते, दूध, शराब और बहुत कुछ कहाँ मिलेगा ये पता चल चूका था। मुझे एक चायवाले के बारेमें पता चला जो अद्भुत समोसे (भारतीय नाश्ता) बनाता था। मुझे रास्तें आसानी से समझ में नहीं आते हालांकि, अब बाजार के चारों ओर की मुख्य सड़कें मेरी स्मृति में हमेशा के लिए रेखांकित हो गई है।

मैं कबूल करती हूँ कि खरीदारी इतना भी ऊब जाने वाला काम नहीं है।

मैंने एक और स्वयंसेवक के साथ त्योहार के लिए पत्रिका बनाई थी। जब हमारा मसौदा तैयार हो गया, हमने उन्हें लिखना शुरू कर दिया। मैंने लिखने में भूल की। मैं इसे मिटा नहीं सकती थी क्योंकि मैंने सीधे पेन के साथ लिखना शुरू कर दिया था। मेरे साथी ने मुझे डांटा और मैंने उससे वादा किया कि मैं फिर कभी यह गलती नहीं दोहराऊंगी ।

मैं मानती हूं कि हालांकि मैं अब एक शिक्षक हूँ, मैंने यह गलती के लिए खूब डांट खाई।

कई ऐसी चीजें हैं जो मैंने सीखी हैं लेकिन उनसे बेखबर हूँ। मैं जितनेभी बार अपनी एहसानमंदी जताऊं वो कम ही होगा। मैं आशा करती हूँ की मुझे भविष्य में ऐसे अनेकों अनुभव मिले।


मूळ विचार: इंग्रजी


मी माझ्या विद्यार्थी जीवनापासून अनेक संघटनांसाठी स्वेच्छेने काम केले आहे. आपण सहसा वेगवेगळ्या कारणास्तव स्वयंसेवक बनतो. मी येथे काही कारणे लिहीत आहे.

  • काम चांगले आहे.
  • आपल्याला नवीन अनुभव हवे आहेत.
  • स्वयंसेवक म्हणून संस्थेसाठी आपण आवश्यक आहोत.
  • आपल्याकडे खूप वेळ आहे आणि घालवण्याचा हा एक विधायक मार्ग आहे.

मी स्वयंसेवक म्हणून माझ्या आयुष्यातील बऱ्याच गोष्टी कबूल करते.

अंघोळ एक लक्झरी आहे

मी स्वयंसेवक झाल्यावर, कला महोत्सवांसाठी किंवा फुलपाखरे वाचवण्याकरिता, सर्व टीम सकाळपासून रात्रीपर्यंतच्या कार्यक्रमांसाठी एकत्र काम करत असे. काहीवेळा, रात्रीदेखील. जेव्हा मी वॉल आर्ट फेस्टिवलसाठी स्वयंसेवक म्हणून काम केले तेव्हा मी सगळ्यांबरोर सकाळी उठून, एकत्र काम करून आणि त्यांच्यासोबतच राहत होते. याची काम लवकर पूर्ण करण्यासाठी मदत होते. जेव्हा मी मुंबईजवळ स्वयंसेवक म्हणून काम करायचे तेव्हा घरी परतल्यावर गरम पाण्याची अंघोळ आणि आरामदायी झोप हवी असायची. जेव्हा सगळे एकत्र राहतात तेव्हा ते एकच बाथरूम देखील वापरतात. मग आंघोळीसाठी एक रांग लागलेली असते. तर, जर आपण अंघोळ करत वेळ घालवला, तर थोड्या वेळाने कोणीतरी दार हलकेच ठोठावत. जे आपणास आठवण करून देतं की पुढील व्यक्ती प्रतीक्षा करत आहे.

मी कबूल करते कि मी बाथरूम मध्ये गाणी ऐकण्यासाठी मोबाइल घेऊन जायचे. अंघोळ करताना बरंही वाटायचं आणि वेळेवरही लक्ष्य ठेवायला मदत व्हायची.

स्वतःला शोधताना

स्वयंसेवक म्हणून निरनिराळे अनुभव घेताना मला जाणवलं कि आपल्या कल्पनेपेक्षा आपण अधिक सक्षम आहोत.

मी जेव्हा मुलांबरोर काम करायचे तेव्हा फार वेगळ्या जिवंतपणाची जाणीव व्हायची. मुलांबरोबर रहाणे आणि त्यांना शिकण्यास मदत करणे मला जगातील कोणत्याही गोष्टीपेक्षा अधिक समाधान देते. मला हे समजायला खूप वेळ लागला. मी ज्या दोन मोठ्या प्रकल्पांवर काम केलं (वॉल आर्ट फेस्टिवल आणि ब्रिन्ग बॅक बटरफ्लाईज) त्यामध्ये मुलांसोबत संवाद साधण्याची आवश्यकता होती आणि अधिक महत्त्वाचे म्हणजे प्रभावीपणे त्यांच्याशी जोडलं जाण्याची. माझा अजूनही विश्वास बसत नाही कि मला हे जमल.

मला मान्य आहे कि माझ्या मनात किमान शंभर वेळा तरी शंका आली. माझ्यासाठी मुलंच सर्वकाही आहेत. हे सर्व या प्रकल्पांमुळेच शक्य झालंय. त्यांचे खूप धन्यवाद.

मी लोकांशी बोलू शकते आणि त्यांच्याशी जोडली जाऊ शकते याची जाणीव व्हायला मला खूप वेळ लागला. आणखी असा कि मला खरंतर व्यासपीठावर जाऊन बोलायला भीती वाटत नाही. पण लोकांशी संवाद साधताना किंवा व्यासपीठावर बोलताना मला अजूनही भीती वाटते. मी अगदी फार चांगलं नाही पण व्यासपीठावर बरं बोलते. वरील दोन्ही प्रकल्पांमध्ये मी विविध प्रकारचे शिक्षक, विद्यार्थी, पालक आणि अगदी प्राचार्य यांच्याशी संवाद साधला. प्रकल्प यशस्वी झाले म्हणजे मी माझं काम ठीकठाक केलं असावं.

मी कबूल करते कि व्यासपीठाच्या पायऱ्या चढतांना अजूनही माझे पाय कापतात. पण मी कबूल करते की मला आता लोकांशी बोलताना कमी भीती वाटते.

मला शॉपिंग आवडत नाही. जेव्हा मी आर्ट फेस्टिवलसाठी स्वयंसेवक म्हणून काम करण्यास सुरुवात केली, तेव्हा मी कधीच कल्पनाही केली नव्हती की मी स्वतः बाजारपेठेत जाऊन खरेदी करेन. जेव्हा मी प्रथम बिहार, भारत मधील खगारीया मार्केटमध्ये गेले, तेव्हा मी थोडीशीच फिरले. फेस्टिवलच्या शेवटच्या दिवसापर्यंत मला इलेक्ट्रिकल टेस्टर्स, झाडू, धूळ, मसाले, फळे, बूट, दुधाचे पदार्थ, अल्कोहोल आणि काहीही आणि सर्वकाही कुठे मिळतं हे मला ठाऊक झालं होतं. मला एक फार छान समोसे (भारतीय नाश्ता) बनवणारा चहावाला भेटला. मला सहज रस्ते समजत नाहीत पण आता बाजारपेठेतले मुख्य रस्ते माझ्या स्मृतीत कायमचे कोरले गेलेत.

मी कबूल करते की शॉपिंग हे इतकंही कंटाळवाणे नाही.

मी एका दुसऱ्या स्वयंसेविकेसोबत या उत्सवासाठी माहिती पत्रिका बनवली. जेव्हा मसुदा तयार झाला, तेव्हा आम्ही लिहिणे सुरु केले. मी लिहिताना एक चूक केली. मी ते खोडून टाकू शकत नव्हते कारण मी पेनाने लिहायला सुरुवात केली होती. मला तिच्याकडून चांगलाच ओरडा मिळाला. मी तिला वाचन दिलं कि मी परत अशी चूक करणार नाही.

मी कबुल करते कि आता जरी मी एक शिक्षिका असले तरी तेव्हा मी मात्र चूक करून खूप ओरडा खाल्ला होता.

बऱ्याच गोष्टी मी माझ्या नकळतच शिकले. मी स्वयंसेवक म्हणून काम करताना मला जे अनुभव आले त्याबद्दल मी कितीही कृतज्ञता व्यक्त केली तरी कमी पडेल. मी आशा करते कि भविष्यात मला असे खूप खूप अनुभव येत राहतील.

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