A little about hands

 

Original thought: English

 

A little about hands

When you engage in any kind of body relaxing meditation, you concentrate on each of your body parts and feel that it is relaxing. During this, I always feel that we don’t give enough attention to our hands and feet. Without them, we wouldn’t be able to do anything.

I have always been a fan of hands, especially busy hands.

When hands are working, I call them busy hands. People tell me that they are busy but I have always found people’s hands busier than them.

Today, I am going to offer my insights into this world of hands.

Let’s start from simple things. When we wake up, it’s our hands that first come out of their resting position. Sometimes, while sleeping also we make our hands work making them support our head and neck. Getting ready would be impossible without hands, like brushing teeth, bathing. In India, we also eat with hands. It’s obvious to use hands for doing all these things.

What about talking? It seems like a task of the mouth. When we speak, we intentionally or unintentionally move our hands and make gestures which help us express more than we can with spoken words.

While thinking we sometimes start scratching our heads, resting our chin on our palm, standing with hands on our waist. We are simply thinking, doing nothing physically, but the amazing hands are at work.

After sitting down for long time, we are trying to get up and we put all our faith into hands and get up easily when are feet may not be that steady.

Remember the last time you fell down, you put your hands on the ground to save your torso and head. I bet you sprained your wrist a bit. Because I sure did.

I have mentioned how hands come to rescue when words are not enough or well when there are simply no words. A pat on the back, a smiling high-five, a non-stop applause, a firm handshake. There is so much more. Gently rubbing the palm to tell them that we are there for them no matter what. Gently stroking and patting the back attempting to convey that things would be fine. The touch of a motherly hand stroking the hair of a child. Feeling reassured because someone is holding our hand in theirs. I know its little angry but a tight slap across the face for defending us or for attacking someone is impossible without hands. Hands convey it all, be it joy, surprise, disgust, fear, anger—separate and mixed.

I look at hands as the best tool that was ever created. They do everything. Unlike all the other man-made tools, this tool does not limit itself to the set function. This tool adopts each and every function that is possible. It changes itself according to the function. It suffers and moulds in the learning process.

My mother hands can withstand more heat than others. They quickly lift a hot pot without burning themselves. My brother, a Tabala player, has hard and toned hands. My friend types a lot, she has a dark spot that has developed at the base of her palm. The factory workers who do a lot of hard work have blisters on their hands. The potter’s hand get all muddy and they create beautiful utensils. An artist let’s his hands be possessed by his creativity and the artwork takes shape. The busy hands are shaping all that is around us every day, every hour and every moment.

Today, I take this opportunity to say thank you to all the hands.

To my own hands, I want to tell that I feel blessed that I have them. ❤

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मूल विचार: अंग्रेजी

 

कुछ हाथों के बारे में

जब हम किसी भी तरह का ध्यान शरीर को विश्राम देने हेतु करते हैं, हम अपने शरीर के हर एक अंग पर ध्यान केंद्रित कर ऐसे महसूस करते हैं कि उस अंग को आराम मिल रहा हैं। ये करते वक़्त मुझे हमेशा महसूस होता हैं कि हम हमारे शरीर पर खास कर हाथों और पैरो पर ध्यान नहीं देतें। हलाकि उनके बिना हम कुछ भी कर नहीं पाएंगे।

मैं हमेशासेही हांथों की प्रशंसक रहीं हूँ खास कर व्यस्त हांथों की।

जब लोगों के हाँथ कुछ काम कर रहे होते हैं, तब मैं उन्हें व्यस्त हाँथ कहती हूँ। लोग मुझे कहते हैं कि वह व्यस्त हैं, लेकिन मैंने उनके हांथों को उनसे ज्यादा व्यस्त पाया हैं।

आज मैं आपके साथ मैंने इस हांथों के विश्व के बारेमें जो चीजें महसूस कि वह बाँटना चाहती हूँ।

चलो, आसान चीजों से शुरवात करते हैं। जब हम जग जाते हैं तो हाँथ ही अपने आराम कि स्थिति से पहले बाहर आते हैं। कभी कबार तो सोते हुए भी सर और गर्दन को सहारा देने के लिए हम अपने हांथों से काम करवाते हैं। सुबह तैयार होना तो हांथों के बिना नामुमकिन हो जाएगा चाहे वो दांत साफ करना हो या नहाना। भारत मैं तो हम खाना भी हाँथ से खाते हैं। इन सब कामों के लिए का हांथों का इस्तेमाल करना तो आम बात हैं।

बात करना? उसका क्या? वो तो जरूर ही मुँह का काम हैं। बात करते वक़्त हम जानबूझकर या अनजाने में हाँथ हिलाते हैं और इशारे करते हैं। ये हमें वो भाव व्यक्त करने मैं मदत करते हैं जो हमारे शब्द नहीं कर पाते।

सोचते वक़्त कभी हम सिर खुजाने लगते हैं, हथेली पर अपनी ठोड़ी रख देते हैं, दोनों हाँथ कमर पर रख देते हैं। हम तो बस सोच रहे हैं, कुछ जिस्मानी काम तो नहीं। पर हमारे अद्भुत हाँथ तो काम में जुटे हुए हैं।

लम्बे समय के लिए बैठे रहने के बाद जब हम उठने का प्रयास करते हैं और हमारे पैर इतने स्थिर नहीं होते, तो हम हमारा सारा भरोसा हमारे हांथों पर रखकर आसानी से उठ जाते हैं।

याद करो पिछली बार आप कब गिरे थे? अपने सिर और धड़ को बचाने के लिए अपने हांथों को हम जमीन पर पहले रखते हैं। जरूर आपके कलाई में मोच आई होगी। मुझे पता हैं क्योंकि मेरे आई थी।

मैंने ऊपर जब लब्ज कम पड़ते हैं तो हाँथ कैसे काम आते हैं उसके बारे में लिखा हैं। सिर्फ उस वक़्त ही नहीं जब कहने के लिए लब्ज ही न हो, तो भी हाँथ ही काम आते हैं। किसीकी पीठ थपथपाना, ताली देना, तालियोंकी गड़गड़ाहट करना, मजबूती से हाँथ मिलाना, और बहुत कुछ। कुछ भी हो मैं तुम्हारे साथ हूँ ये कहने के लिए धीरे से हाँथ सहलाना। सब ठीक हो जाएगा ये कहने के लिए किसीके पीठ पर हाँथ फेरना और थपथपाना। माँ का हाँथ से अपने बच्चे के सिर को सहलाना। किसीका हाँथ पकड़ लेने से फिरसे उसपे यकीन करना। मुझे पता हैं ये थोड़ा गुस्सैल लगेगा। खुद की रक्षा करने के लिए या किसी पर वार करने के लिए उसके मुँह पर करारा तमाचा लगाना हो ये काम हांथों के बिना नामुमकिन हैं। हमारे हाँथ सब बयान कर देते हैं, ख़ुशी, अचरज,  घृणा,  डर, गुस्सा। कभी जुदा जुदा और कभी मिला जुला।

मुझे लगता हैं हाँथ सबसे अच्छा साधन हैं जो कभीभी किसीनेभी बनाया हो। वह सब कर लेते हैं। और मानवनिर्मित साधनो की तरह हाँथ सिर्फ कुछ दिया गया काम करने तक खुदको सिमित नहीं करते। वह हर एक मुमकिन काम खुदमें ढाल लेते है। वह अपने आप को काम के मुताबिक बदल लेते हैं। काम सीखते वक़्त वह सब सहते हुए खुदको बदलते हैं।

मेरे माँ के हाँथ औरो से ज्यादा गर्मी सह सकते हैं। वह जले बिना जल्दी से गरम बरतन उठा लेते हैं। मेरा भाई जो तबला बजाता हैं, उसके हाँथ कठिन और ठोस हैं। मेरी दोस्त बहुत टंकलेखन करती हैं उसके हथेली के निचले हिस्से में एक कला निशान-सा बन गया हैं। अनेकों कारखानों में काम करने वाले मजदूरों के हांथों पर छाले पड़ जाते है।

कुम्हार के हाँथ मिटटी से पुरे पुरे सन जाते हैं और वह विविध बरतन बनाता हैं। एक कलाकार अपनी सर्जनशीलता को अपनी हथेलियों से आकार देकर कलाकृति साकार करता हैं। व्यस्त हाँथ हमारे आस पास की हरेक चीज को उसका प्रारूप प्राप्त करने में मदत करते हैं हर रोज, हर घंटे, हर पल।

आज में इस जगह सभी हाथों का धन्यवाद् करना चाहती हूँ।

और मेरे खुदके हांथों को यही कहना चाहती हूँ की मैं बहुत खुशनसीब हूँ की मेरे पास हाँथ हैं।

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मूळ विचार: इंग्रजी

 

हातांबाबतीत काही

जेव्हा आपण कोणत्याही प्रकारचं शरीराला विश्रांती देणारं ध्यान करतो तेव्हा आपण आपल्या प्रत्येक शरीराच्या भागावर लक्ष केंद्रित करतो आणि अशी कल्पना करतो कि त्या अवयवाला आराम मिळतो आहे. यामध्ये मला नेहमी वाटतं कि आपण आपल्या हातांना आणि पायांना इतर वेळी म्हणावं तसं महत्व देत नाही. खरंतर त्यांच्याशिवाय आपण काहीही करू शकणार नाही.

मला नेहमीच हात आवडायचे, मुख्यतः व्यस्त हात.

जेव्हा हात काम करत असतात तेव्हा मी त्यांना व्यस्त हात म्हणते. लोक म्हणतात कि ते व्यस्त आहेत पण मला तर लोकांपेक्षा त्यांचे हातंच जास्त व्यस्त आहेत असं वाटतं.

आज मी हातांच्या जगाविषयी मी अनुभवलेल्या गोष्टी सांगणार आहे.

चला, साध्य गोष्टींपासून सुरुवात करूया. जेव्हा आपण झोपून उठतो तेव्हा आपले हात त्यांच्या आरमातून पहिल्यांदा बाहेर येतात. कधीकधी झोपेतही आपण आपल्या हातांना कामाला लावतो त्यांना डोक्याला किंवा मानेला आधार द्यायला उशाशी घेऊन. दात घासण्यापासून ते अंघोळ करण्यापर्यंत रोजचं आन्हिक आवरणं हातांशिवाय अशक्य होऊन जाईल. भारतात तर आपण खातोही हातानेच. पण या सगळ्या कामांसाठी हात वापरणं साहजिकच आहे म्हणा.

पण बोलण्याचं काय? ते तर तोंडाचं काम दिसतं. जेव्हा आपण बोलत असतो तेव्हा कधी जाणूनबुजून तर कधी नकळत आपण आपले हात हलवतो आणि हातवारे करत ते सारं काही व्यक्त करण्याचा प्रयत्न करतो जे आपल्याला शब्दांत सांगता येत नाही.

कधीकधी विचार करतांना आपण डोकं खाजवतो, तळहातावर हनुवटी ठेवून बसून राहतो, कमरेवर हात घेऊन  राहतो. आपण तर फक्त विचार करत असतो, काहीच शारीरिक क्रिया घडत नसते पण तरीही आपले हे अजब हात मात्र काम करत असतात.

खूप वेळ बसल्यावर उठतांना आपण बिनधास्त सगळा भरवसा हातांवर टाकून सहज उठतोही कारण त्यावेळी पाय एवढे स्थिर नसतात.

मागल्या वेळी जेव्हा तुम्ही पडला असाल तेव्हाही धड आणि डोकं वाचवण्यासाठी तुम्ही साहजिकपणे हात जमिनीवर टेकवले असतील. तेव्हा तुमचं मनगट देखील मुरगळलं असेल. मला माहित्येय ना कारण माझं मुरगळलं होतं.

मी वरती उल्लेख केलाय कि कसे शब्द तोकडे पडल्यावर किंवा कधीकधी तर काही शब्दच नसल्यावर हात कसे मदतीला धावून येतात. पाठीवरची थाप, हसता हसता दिलेली टाळी, टाळ्यांचा कडकडाट, ठोस हस्तांदोलन, आणि बरंच काही. आपण नेहमीच त्यांच्याबरोर आहोत हे सांगण्यासाठी कोणाच्यातरी हातावरून अलगद हात फिरवायचा. सगळं ठीक होईल हे सांगण्यासाठी कोणाच्यातरी पाठीवर थोपटत हात फिरवत राहायचं. आईच्या मायेने तिने बाळाच्या केसांतून हात फिरवायचा. कोणीतरी आपला हात त्यांच्या हातात धरलाय म्हणून मनातून आश्वस्त व्हायचं. हे थोडं रागीट वाटेल पण स्वतःचं रक्षण करण्यासाठी किंवा कोणाला मारण्यासाठी जर एखादी सणसणीत चपराक लागवायची असेल तर तेही हाताशिवाय अशक्यच आहे. हात सारंकाही व्यक्त करतात, आनंद, अचंबा, घृणा, भीती, राग, वेगवेगळाही आणि एकत्रही.

मला वाटतं हात हे जगात बनलेलं सर्वोत्तम साधन आहे. ते सगळंच करतात. इतर मानवनिर्मित साधनांसारखं ते स्वतःला केवळ दिलेल्या कामपर्यंत मर्यादित ठेवत नाहीत. हात करायच्या कामाप्रमाणे, मग ते कोणतंही असो, बदलून जातात. ते कामाप्रमाणे स्वतःला घडवून घेतात. यात ते सहनही करतात आणि नवा आकारही घेतात.

माझ्या आईचे हात जास्त तापमान सहन करू शकतात. ते सहज एखादं गरम भांडं स्वतःला भाजून न घेता उचलू शकतात. माझा भाऊ जो तबला वाजवतो त्याचे हात राठ पण घोटीव झालेत. माझी एक मैत्रीण टंकलेखनाचं काम करते. तिच्या तळव्याच्या खालच्या बाजूला एक गडद भाग तयार झालाय. अनेक कारखान्यांनमध्ये काम करणाऱ्या लोकांच्या हाताला घट्टे पडतात.

कुंभाराचे हात मातीने भरून जातात पण ते सुंदर भांडी घडवतात. एक कलाकार आपल्या हातांमध्ये आपल्या सृजनशीलतेला योजून नवनव्या कलाकृतींना जन्म देतो. हे व्यस्त हात आपल्या आजूबाजूची एकेक वस्तू घडवत असतात दररोज, दरघटका, दरक्षण.

आज मी त्या सगळ्या हातांचे आभार मानते.

माझ्या हातांना एवढाच सांगू इच्छिते कि मी खूप नशीबवान आहे कि मला हात आहेत.

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